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Thursday, February 15, 2018

खलल


न नींद न ख्वाब
न आँसू न उल्लास,
वर्षों से उसके नैन कटोरे  
यूँ ही सूने पड़े हैं !

न शिकवा न मुस्कान
न गीत न संवाद,
सालों से उसके शुष्क अधरों के
रिक्त सम्पुट
यूँ ही मौन पड़े हैं !

न आवाज़ न आहट
न पदचाप न दस्तक,
युग-युग से उसके मन के
इस निर्जन वीरान कक्ष में
कोई नहीं आया !

न सुख न दुःख
न माया न मोह
न आस न निरास
न विश्वास न अविश्वास  
न राग न द्वेष
हर ध्वनि प्रतिध्वनि से
नितांत असम्पृक्त एवं विरक्त
आजीवन कारावास का
दंड भोगता यह एकाकी बंदी
अपनी उम्र की इस निसंग
अभिशप्त कारा में
पूर्णत: निर्विकार भाव से  
न जाने किस एकांत साधना में
एक अर्से से लीन है ! 

ऐसे में उसकी तपस्या में
‘खलल’ डालने के लिए
किसने उसके द्वार की साँकल
इतनी अधीरता से खटखटाई है ?

ओह, तो यह तुम हो मृत्युदूत !
कह देना प्रभु से,
परम मुक्ति का तुम्हारा यह
अनुग्रह्पूर्ण सन्देश भी
आज उस निर्विकारी ‘संत’ को
पुलकित नहीं कर पायेगा 
आज वह अपने अंतर की 
अतल गहराइयों में स्वयं ही
समाधिस्थ हो चुका है !



चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद  


    

Tuesday, February 13, 2018

नीलकंठ का आर्तनाद

महा शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 
हे भक्तों
यह कैसी साँसत में तुमने मुझे डाला है
आज तो तुमने मेरे नाम और
मेरे अस्तित्व को ही
कसौटी पर परखने के लिये
मुझे ही ज़हर के समुद्र में
पटक डाला है !

समुद्र मंथन के समय
समुद्र से निकले हलाहल का
देवताओं के अनुरोध पर जग हित में
मैंने पान तो अवश्य किया था
लेकिन मेरे हिस्से में
आजीवन विष ही विष आएगा
यह आकलन मैंने कब किया था !

जगत वासियों तुमने तो संसार में
भाँति-भाँति के विष बनाने की
अनगिनत रसायनशालायें खोल डाली हैं ,
हलाहल से पूर्णत: सिक्त मेरे कंठ की
सीमा और विस्तार को भी तो जानो
इसमें बूँद भर भी
और समाने के लिये
ज़रा सी भी गुंजाइश
क्या और निकलने वाली है ?

तरह-तरह के अनाचार, अत्याचार ,
दुराचार, व्यभिचार, लोभाचार
भ्रष्टाचार और पापाचार
के रिसाव से यह जग भरता जाता है ,
और इतना अधिक विष
अपने कंठ में सम्हाल न पाने की
मेरी असमर्थता को संसार के सामने
उजागर करता जाता है !

मेरा कंठ ही नहीं आज इस
विष स्नान से मैं सम्पूर्ण ही
नीला हो चुका हूँ ,
और अपनी अक्षमताओं के बोझ तले
अपराध बोध से ग्रस्त हो
अपनी ही दृष्टि में
गिर चुका हूँ !

अगर यही हाल रहा तो
हे जगत वासियों
नीलकंठ होने के स्थान पर
मैं विष के इस नीले सागर में
समूचा ही डूब जाउँगा ,
और अगर विष वमन का
तुम्हारा यह अभियान अब नहीं रुका तो
इस देवलोक को छोड़
अन्यत्र कहीं चला जाउँगा
और इस जगत की रक्षा के लिये
फिर कभी लौट कर नहीं आउँगा !

साधना वैद

Saturday, February 10, 2018

इन्हें भी सम्मान से जीने दें



इसे सामाजिक न्याय व्यवस्था की विडम्बना कहा जाये या विद्रूप कि जिन वृद्धजनों के समाज और परिवार में सम्मान और स्थान के प्रति तमाम समाजसेवी संस्थायें और मानवाधिकार आयोग बडे सजग और सचेत रहने का दावा करते हैं और समय – समय उनके हित के प्रति पर अपनी चिंता और असंतोष का उद्घाटन भी करते रहते हैं उन्हींको पराश्रय और असम्मान की स्थितियों में जब ढकेला जाता है तब सब मौन साधे मूक दर्शक की भूमिका निभाते दिखाई देते हैं। 
ऐसी धारणा है कि साठ वर्ष की अवस्था आने के बाद व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं और वह शारीरिक श्रम के काम के लिये अक्षम हो जाता है और यदि वह प्रबन्धन के कार्य से जुड़ा है तो वह सही निर्णय ले पाने में असमर्थ हो जाता है इसीलिये उसे सेवा निवृत कर दिये जाने का प्रावधान है । अगर यह सच है तो संसद में बैठे वयोवृद्ध नेताओं की आयु तालिका पर कभी किसीने विचार क्यों नहीं किया ? उन पर कोई आयु सीमा क्यों लागू नहीं होती ? क़्या वे बढती उम्र के साथ शरीर और मस्तिष्क पर होने वाले दुष्प्रभावों से परे हैं ? क़्या उनकी सही निर्णय लेने की क्षमता बढती उम्र के साथ प्रभावित नहीं होती ? फिर किस विशेषाधिकार के तहत वे इतने विशाल देश के करोड़ों लोगों के भविष्य का न्यायोचित निर्धारण अपनी जर्जर मानसिकता के साथ करने के लिये सक्षम माने जाते हैं ? यदि उन्हें बढ़्ती आयु के दुष्प्रभावों से कोई हानि नहीं होती तो अन्य लोगों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जाता है ?

अपवादों को छोड़ दिया जाये तो साठ वर्ष की अवस्था प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अधिक अनुभवी, परिपक्व और गम्भीर हो जाता है और उसके निर्णय अधिक न्यायपूर्ण और समझदारी से भरे होते हैं । ऐसी स्थिति में उसे उसके सभी अधिकारों और सम्मान से वंचित करके सेवा निवृत कर दिया जाता है जो सर्वथा अनुचित है । घर में उसकी स्थिति और भी शोचनीय हो जाती है । अचानक सभी अधिकारों से वंचित, शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से क्लांत वह चिड़चिड़ा हो उठता है । घर के किसी भी मामले में उसकी टीकाटिप्पणी को परिवार के अन्य सदस्य सहन नहीं कर पाते और वह एक अंनचाहे व्यक्ति की तरह घर के किसी एक कोने में उपेक्षा, अवहेलना, असम्मान और अपमान का जीवन जीने के लिये विवश हो जाता है । उसकी इस दयनीय दशा के लिये हमारी यह दोषपूर्ण व्यवस्था ही जिम्मेदार है । साठवाँ जन्मदिन मनाने के तुरंत बाद एक ही दिन में कैसे किसीकी क्षमताओं को शून्य करके आँका जा सकता है ?
वृद्ध जन भी सम्मान और स्वाभिमान के साथ पूर्णत: आत्मनिर्भर हों और उन्हें किसी तरह की बैसाखियों का सहारा ना लेना पड़े इसके लिये आवश्यक है कि वे आर्थिक रूप से भी सक्षम हों । इसके लिये ऐसे रोज़गार दफ्तर खोलने की आवश्यक्ता है जहाँ
 साठ वर्ष से ऊपर की अवस्था के लोगों के लिये रोज़गार की सुविधायें उपलब्ध करायी जा सकें । प्राइवेट कम्पनियों और फैक्ट्रियों में बुज़ुर्ग आवेदकों के लिये विशिष्ट नियुक्तियों की व्यवस्था का प्रावधान सुनिश्चित किया जाये । इस बात पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि उनको उनकी क्षमताओं के अनुरूप ही काम सौंपे जायें । आर्थिक रूप से सक्षम होने पर परिवार में भी बुज़ुर्गों को यथोचित सम्मान मिलेगा और उनकी समजिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी । यह आज के समय की माँग है कि समाज में व्याप्त इन विसंगतियों की ओर प्रबुद्ध लोगों का ध्यान आकर्षित किया जाये और वृद्ध जनों के हित के लिये ठोस और कारगर कदम उठाये जायें । तभी एक स्वस्थ समाज की स्थापना का स्वप्न साकार हो सकेगा जहाँ कोई किसीका मोहताज नहीं होगा !   


साधना वैद

Wednesday, February 7, 2018

पहाड़ी नदी



स्वर्ग से नीचे
धरा पर उतरी
पहाड़ी नदी

करने आई
उद्धार जगत का
कल्याणी नदी

बहती जाती 
अथक अहर्निश
युगों युगों से 

करती रही 
धरा अभिसिंचित 
ये सदियों से 

जीवन यह 
है अर्पित तुमको 
हे रत्नाकर 

उमड़ चली 
मिलने को तुमसे 
मेरे सागर 

सूर्य रश्मि से 
 पिघली हिमनद  
सकुचाई सी 

 हँसती गाती  
छल छल बहती 
इठलाई सी 

उथली धारा
बहती कल कल
प्रेम की धनी

उच्च चोटी से 
झर झर झरती 
झरना बनी 

नीचे आकर 
बन गयी नदिया 
मिल धारा से 

उन्मुक्त हुई
निर्बंध बह चली 
हिम कारा से

बहे वेग से 
भूमि पर आकर 
मंथर धारा 

मुग्ध हिया में 
उल्लास जगत का 
समाया सारा 

एक ही साध
हो जाऊँ समाहित
पिया अंग मैं

रंग जाऊँगी 
इक लय होकर 
पिया रंग मैं 

मेरा सागर 
मधुर या कड़वा 
मेरा आलय 

सुख या दुःख 
अमृत या हो विष
है देवालय 

चाहत बस 
पर्याय प्रणय की
मैं बन जाऊँ

मिसाल बनूँ
साजन के रंग में 
मैं रंग जाऊं 



साधना वैद     
   

Thursday, February 1, 2018

इन्द्रधनुष




देखो
अप्रतिम सौंदर्य के साथ
सम्पूर्ण क्षितिज पर
अपनी सतरंगी छटा बिखेरता
इन्द्रधनुष निकल आया है !
भुवन भास्कर के
उज्जवल मुख पर
आच्छादित बादलों के
अवगुंठन को
पल भर में उड़ा कर  
सूर्य नारायण की
प्रखर उत्तप्त रश्मियों ने  
वातावरण में व्याप्त
वाष्प कणों को 
उद्दीप्त कर ऐसे
अनूठे इन्द्रधनुष का
निर्माण कर दिया है कि  
धरा से अम्बर तक
समूचा विस्तार इन्द्रधनुष के
अलौकिक रंगों से रंग गया है !   
दिव्य सौंदर्य से प्रदीप्त
नवोढा सृष्टि सुन्दरी
अपने प्रशस्त भाल पर
सलोने सूर्य की
स्वर्णिम टिकुली लगा ,
सतरंगी इन्द्रधनुष की
झिलमिलाती चूनर अपने
आरक्त आनन पर ओढ़
इठलाती इतराती
सबको विस्मय विमुग्ध
कर रही है और
सुदूर देवलोक में
सृष्टि सुन्दरी के इस
पल पल बदलते दिव्य
सौंदर्य पर आसक्त हो
कामदेव ने अपने धनुष की
प्रत्यंचा पर फूलों के
बाणों को साध लिया है !


साधना वैद

Tuesday, January 30, 2018

उलझन



अभी तक समझ नहीं पाई कि 

भोर की हर उजली किरन के दर्पण में 
मैं तुम्हारे ही चेहरे का 
प्रतिबिम्ब क्यों ढूँढने लगती हूँ ?
हवा के हर सहलाते दुलराते 
स्नेहिल स्पर्श में
मुझे तुम्हारी उँगलियों की 
चिर परिचित सी छुअन 
क्यों याद आ जाती है ?
सम्पूर्ण घाटी में गूँजती 
दिग्दिगंत में व्याप्त 
हर पुकार की 
व्याकुल प्रतिध्वनि में 
मुझे तुम्हारी उतावली आवाज़ के 
आवेगपूर्ण आकुल स्वर 
क्यों याद आ जाते हैं ?
यह जानते हुए भी कि 
ऊँचाई से फर्श पर गिर कर 
चूर-चूर हुआ शीशे का बुत 
क्या कभी पहले सा जुड़ पाता है ? 
धनुष की प्रत्यंचा से छूटा तीर 
लाख चाहने पर भी लौट कर
क्या कभी विपरीत दिशा मे मुड़ पाता है ? 
वर्षों पिंजरे में बंद रहने के बाद 
रुग्ण पंखों वाला असहाय पंछी
दूर आसमान में अन्य पंछियों की तरह
क्या कभी वांछित ऊँचाई पर उड़ पाता है ?
मेरा यह पागल मन 
ना जाने क्यूँ 
उलझनों के इस भँवर जाल में
आज भी अटका हुआ है । 


साधना वैद

Thursday, January 25, 2018

बलिहारी है भंसाली जी


पद्मावती का बवाल इतना विकट होता जा रहा है कि यह कब और कैसे थमेगा समझ ही नहीं आ रहा है ! संजय लीला भंसाली जी की प्रवृत्ति तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने की है इसमें तो कोई शंका शुबहा है ही नहीं ! कलात्मक स्वतन्त्रता की आड़ लेकर वे मूल कथा की किस तरह गर्दन मरोड़ते हैं देवदास इसका ज्वलंत उदाहरण है लेकिन इतने नामी निर्माता निर्देशक होने के साथ ही थोड़ी सी व्यावहारिक बुद्धि भी विकसित कर लेते कि कहाँ और किस चरित्र के साथ कितनी छेड़छाड़ करनी चाहिए तो आज उन्हें ये दिन न देखने पड़ते ! पारो, चंद्रमुखी और मस्तानी की पंक्ति में ही पद्मावती को रख कर उन्होंने बहुत बड़ी भूल की है ! देवदास फिल्म में पारो और देवदास का किस तरह से कैरेक्टर एसेसिनेशन किया गया है इसकी पीड़ा उनसे पूछिए जिनके दिलों के बहुत करीब यह उपन्यास है ! 

भंसाली जी को मुख्य पात्रों को नचवाने का बहुत शौक है ! शायद भीड़ को सिनेमा हॉल तक जुटाने का एक यही नुस्खा उन्हें आता है ! शरतचंद्र के उपन्यास में जिन पारो और चंद्रमुखी ने एक दूसरे को कभी रू ब रू देखा भी नहीं भंसाली जी ने अपनी फिल्म में दोनों को एक साथ नचवा दिया !  बाजीराव मस्तानी में भी उन्होनें कलात्मक स्वतन्त्रता के नाम पर लिबर्टी लेकर मराठा रानी और मस्तानी को नचवा दिया ! बाजीराव के वंशजों ने इस बात पर अपना असंतोष भी व्यक्त किया था लेकिन पब्लिक ने इस असंतोष पर अपनी कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं जताई ! शायद इसी बात से उनका हौसला बढ़ गया और फिल्म पद्मावती में भी उन्होंने खुले आँगन में तमाम दरबारियों और प्रजा के सामने अंग प्रदर्शित करते कपड़े पहना कर पद्मावती से घूमर डांस करवा दिया ! लेकिन पद्मावती में उनकी यह चाल उन्हीं पर भारी पड़ गयी ! रानी पद्मावती का आज भी लोगों के दिलों में कितना सम्मान है और क्या स्थान है इसका अनुमान भंसाली जी नहीं लगा पाए ! 

भंसाली जी तो खैर फिल्म के निर्माता हैं इसलिए इसके प्रदर्शन के लिए वे आकाश पाताल एक करने में लगे हुए हैं तो आश्चर्य की कोई बात नहीं लेकिन हमारी सुप्रीम कोर्ट को क्या हुआ है ? उन्हें फिल्म रिलीज़ करने की अनुमति देने के लिए २५ जनवरी का दिन ही सबसे उपयुक्त लगा जबकि गणतंत्र दिवस समारोह कल होना है ? आतंकी धमकियों से राजधानी में हाई अलर्ट जारी किया गया है और दस देशों के राष्ट्राध्यक्ष और अन्य कई राजनेता विशिष्ट अतिथि के तौर पर गणतंत्र दिवस के अवसर पर समारोह में सम्मिलित होने के लिए भारत आ रहे हैं ! ऐसे समय में इस फिल्म का रिलीज़ होना क्या इतना आवश्यक है कि प्रदेशों की सारी पुलिस और सेना को लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करने के लिए बाकी सारे अहम् मुद्दों की अनदेखी करनी पड़ जाए और इस फिल्म के सफल प्रदर्शन की ड्यूटी में उसे जुटना पड़ जाए ? फिल्म के प्रदर्शन के लिए दो एक हफ्ते और नहीं रुका जा सकता था ?

साधना वैद