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Sunday, May 21, 2017

भाग्यशाली



तुम्हें शायद नहीं पता
तुम्हारी आँखों का दुराव
तुम्हारी बातों का अलगाव
तुम्हारे व्यवहार का भटकाव
तुम लाख मुझसे छिपाने की
कोशिश कर लो
मेरी समझ में आ ही जाता है !
तुम्हारा बेवजह मुझसे नज़रें चुराना,
मुँह फेर व्यस्तता का दिखावा कर
हूँ हाँ वाले रूखे फीके जवाब देना,
चहरे पर अनायास उग आये
कँटीले तारों के जाल में उलझे रहना   
तुम्हें क्या लगता है ये सब
मेरी नज़र से छिपे रहते हैं ?
सच मानो ये मेरे दिल पर भी
उतनी ही तीव्रता से आघात करते हैं
जितनी गहराई से शायद
तुम्हें चोट पहुँचाते हैं !  
तुम्हारी आवाज़ के हर उतार चढ़ाव से
उसमें मुखर होती हर ऊब,
खीझ और उकताहट से
उसकी हर लरज़, हर कम्पन से
खूब परिचित हूँ मैं भी !
उस वक्त भी जब उसमें मेरे लिए
स्वागत और सम्मान होता है
चिंता और व्यग्रता होती है
प्रेम और निष्ठा निहित होती है
और तब भी जब उसमें मेरे लिए
अलगाव और अनादर होता है
व्यंग और कटाक्ष होता है
उपेक्षा और उपहास होता है !  
अक्सर यह विचार मन में आता है
जो देख नहीं सकते
जो सुन नहीं सकते
वो कितने भाग्यशाली हैं
जीवन की कितनी बड़ी कुरूपता के
अभिशाप से वे बचे हुए हैं !
जीवन के कितने पावन, कितने निर्मल,
कितने शुद्ध सौन्दर्य का
रसपान वे कर पाते हैं !
न कुछ बुरा देखते हैं
न ही सुनते हैं
शायद इसीलिये उनके मन में
अजस्त्र प्रेम की एक निर्मल धारा
सदैव प्रवाहित होती रहती है !
आज इसी बात का अफ़सोस है कि
हम देख सुन क्यों पाते हैं !
जो देख सुन न पाते तो
शायद हम भी उतने ही सुखी होते !

साधना वैद  



Sunday, May 14, 2017

रचना हूँ मैं तेरी माँ

मातृ दिवस पर विशेष 



मिट्टी से हूँ गढ़ी हुई

चौखट में हूँ जड़ी हुई

छाया हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


काँटों के संग उगी हुई

तीक्ष्ण धूप में पगी हुई

कलिका हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


युद्ध भूमि में डटी हुई

सुख सुविधा से कटी हुई

सेना हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


संघर्षों से दपी हुई

कुंदन जैसी तपी हुई

मूरत हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


अंतर्मन पर खुदी हुई

रोम रोम पर रची हुई

कविता हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


सात सुरों से सधी हुई

मीठी धुन में बंधी हुई

  विनती हूँ मैं तेरी माँ !  

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


हर पल मेरे पास है तू

हर पल मेरे साथ है तू

धड़कन है तू मेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !

साधना वैद




Tuesday, May 9, 2017

गूँज अनुगूँज



यह न समझना कि
देश की सर्वोच्च अदालत से
अपराधियों को कठोरतम दंड दिलवाकर 
उसके साथ हुए जघन्यतम अपराध की
तनिक भी भरपाई की जा सकेगी,
चंद हैवानों को फाँसी पर लटका कर
उस घायल रूह के टीसते ज़ख्मों की
ज़रा सी भी मरहम पट्टी की जा सकेगी !
कोई भी न्याय, कोई भी दंड, कोई भी फैसला
उस काल खंड में घटित हुए
उस बर्बर कृत्य को धो पोंछ कर
मिटा नहीं सकता, 
और अपार संभावनाओं से भरे
एक हँसते खेलते, विकसित होते
अनमोल जीवन का यूँ पाशविकता की
भेंट चढ़ जाने के दुर्भाग्य को
घटा नहीं सकता !
मर्मान्तक पीड़ा से उपजी
उस मासूम की मर्मभेदी चीखें,
सहायता के लिए याचना करती
उसकी अवश करुण पुकार,
क्रोध, क्षोभ, ग्लानि, घृणा,
हताशा और वेदना से
चरम पर पहुँचा उसका
गगनभेदी आर्तनाद
हमारे आसपास की फिज़ाओं में  
आज भी उसी तरह गूँज रहा है,
यह समाज जो शायद तब भी
हर अनाचार से आँखें मूँदे
इसी प्रकार निस्पृह था
अपराधियों को बचाने के लिए  
निरर्थक दलीलें दे इस
भयावह कटु सत्य से आज भी
आँखें मूँद रहा है !
उस निर्दोष आत्मा का प्रेत   
अनंत काल तक इन हवाओं में
इसी तरह घूमता रहेगा,
और जब तक उसकी चीखों से
हमारे कान इतने बहरे न हो जाएँ
कि उन चीखों के अलावा हमें
और कुछ सुनाई ही न दे,
यह चीत्कार इसी तरह गूँजता रहेगा !
चंद अमानुषों की
पाशविकता की शिकार
उस निर्दोष युवती की
दिल दहला देने वाली
आर्त पुकार का शायद तब कुछ असर हो
जब समाज का हर पुरुष
एक नारी के जीवन का
मोल समझना सीख जाए,  
और उसकी क्षत विक्षत रूह को  
शायद तब कुछ इन्साफ मिले
जब हर अमानुष नारी को समुचित
सम्मान देना सीख जाए !  

साधना वैद !




Saturday, May 6, 2017

बेटी की माँ

मातृ दिवस पर विशेष