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Thursday, June 22, 2017

जीवन की जंग



जीतनी तो थी जीवन की जंग 
तैयारियाँ भी बहुत की थीं इसके लिए 
कितनी तलवारें भांजीं 
कितने हथियारों पर सान चढ़ाई
कितने तीर पैने किये
कितने चाकुओं पर धार लगाई
लेकिन एक दिन सब निष्फल हो गया 
जीवन के इस मुकाम पर आकर 
इतनी ताकत ही कहाँ रही हाथों में
कि कोई भी अस्त्र उठा सकूँ ।
कभी सुना था कि जीवन की जंग 
अस्त्र शस्त्रों से नहीं
खूबसूरत सुरभित फूलों से 
जीती जाती है ।
युद्ध की गगनभेदी रणभेरी से नहीं
सुमधुर स्वर्गिक दिव्य संगीत से
जीती जाती है ।
नहीं जानती इस जंग का 
क्या हश्र होगा लेकिन 
यह तय है कि अब ये हाथ
इतने अशक्त हो उठे हैं कि
इनसे एक फूल भी पकड़ना 
नामुमकिन हो गया है ।
और कानों में दिव्य स्वर्गिक 
जीवन संगीत के स्थान पर 
सिर्फ और सिर्फ तलवारों की 
खनखनाहट ही गूँजती रहती है ।
कोई तो बताये मैं क्या करूँ ।



साधना वैद

Saturday, June 17, 2017

परिवार और रिश्ते


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । समाज है तो परिवार है, परिवार है तो रिश्ते हैं, रिश्ते हैं तो हर रिश्ते की एक मर्यादा है एक ज़रुरत है । परिवार में हर सदस्य का एक सुनिश्चित स्थान है और अपने स्थान के अनुरूप वह हर दूसरे रिश्ते से मान सम्मान, प्यार दुलार पाने व देने का अधिकारी है ।
जब तक जीवन है इंसान इन रिश्तों से बँधा है । साथ ही इन रिश्तों से जुड़ी ज़िम्मेदारियों से भी बँधा है । जैसे जन्म से जुड़े रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होते उनसे जुड़ी ज़िम्मेदारियाँ भी कभी ख़त्म नहीं होतीं । जीवन को सफलतापूर्वक और सुख पूर्वक जीना है तो इन ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए और इन रिश्तों को यथोचित सम्मान देते हुए ही जीना होगा ।
ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता कि आपके पास ज़िम्मेदारियाँ सिफर हो जाएं । इंसान एक ही जीवन में अनेक रिश्तों से जुड़ी अनेक भूमिकाएं निभाता है । किसी एक भूमिका का अंत हो सकता है लेकिन दूसरी भूमिका से जुड़े दायित्व सदैव सामने रहेंगे । यह आपकी सोच और परिपक्वता पर निर्भर करता है कि आप किस रिश्ते और किस भूमिका को अधिक महत्त्व देते हैं और किस रिश्ते को बोझ समझ कर उतार फेंकना चाहते हैं ।
परिवार में जन्म के साथ ही व्यक्ति पुत्र की भूमिका में आ जाता है । इसके साथ ही जीवन के इस सफर में वह भाई, पति व पिता की भूमिका का निर्वाह भी करता है । सारे जीवन इन विभिन्न रूपों को जीना निभाना और हर रिश्ते की कसौटी पर खरा उतरना बहुत ही चुनौती भरा कार्य है इसमें कोई दो राय नहीं हैं । अक्सर किसी एक भूमिका के निर्वाह में ज़रा सी भी कमी आ जाने से कटु आलोचना और घोर मानसिक अनुताप भी झेलना पड़ सकता है । यह समय ही परीक्षा का समय होता है जिसमें आपको विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण होना आवश्यक हो जाता है । आपकी व्यवहार कुशलता, सूझ बूझ और समझदारी का यहाँ कडा इम्तहान ले लिया जाता है । पास या फेल होना आपके हाथ में है ।
रिश्तों का निर्वाह करते समय आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि आज आप जिस स्थान पर दुविधाग्रस्त खड़े हैं कल आपके बच्चे भी उसी जगह पर खड़े होँगे क्योंकि वृद्धावस्था के आगमन के साथ आप उस स्थान पर होंगे जहां आज आपके माता पिता हैं ।
यह सत्य है कि नए रिश्तों में बंधने के साथ ही पुराने रिश्तों की चमक फीकी पड़ने लगती है और उनका गौण हो जाना लाज़िमी हो जाता है लेकिन उनका महत्त्व और उपयोगिता समाप्त हो चुकी है ऐसा समझने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए । जीवन में किसी व्यक्ति की ज़रुरत भले ही शून्य हो जाये उससे जुड़ी भावनायें, प्रेम और आत्मीयता की प्रतीति कभी कम नहीं हो सकती ।
हर रिश्ते और हर भूमिका का जीवन में सामान रूप से महत्त्व होता है । होना तो यह चाहिए कि किसी भी भूमिका के निर्वाह में किसी भी अन्य रिश्ते का निरादर और अवमानना न हो । ना ही कोई व्यक्ति स्वयं को उपेक्षित, प्रताड़ित या अपमानित अनुभव करे । कहने सुनने में यह मुश्किल ज़रूर लगता है लेकिन असंभव तो बिलकुल भी नहीं । बस हर रिश्ते को पूरी ईमानदारी से निभाने की दृढ इच्छाशक्ति होनी चाहिए । रिश्तों को निभाने की प्रतिबद्धता का जज़्बा किसी एक में ही नहीं परिवार के हर सदस्य में होना चाहिए तब ही रिश्तों की गरिमा को संजोया जा सकता है ।

साधना वैद

Tuesday, June 13, 2017

प्रतिदान




देखा तुमने 
तुमने तो अपने तरकश से
केवल एक ही तीर फेंका था

लेकिन उस एक तीर ने 
असुरक्षा और आतंक की 
कैसी ज़मीन 
तैयार कर दी है ।
अब देखो आत्मरक्षा के लिए 
सबके हाथों में कितने पैने
और नुकीले तीर सज गए हैं ।
चेहरे पर भय है,
वाणी में ज़हर उतर आया है ,
आँखों में नफ़रत है और 
हृदय में बदले की आग 
इतनी तीव्रता से धधक उठी है कि
प्रतिघात करने में 
ज़रा भी देर नहीं लगती ।
हल्की सी सरसराहट से भी
चौकन्ने हो सब तुरंत ही 
अपने अस्त्र शस्त्रों से लैस हो जाते हैं 
और मोर्चा सम्हाल लेते हैं ।
फिर एक पल भी यह सोचने में 
गँवाये बिना कि आगंतुक 
दोस्त है या दुश्मन 
अपनी पूरी ताक़त से उस पर
टूट पड़ते हैं ।
काश तुमने उस वक्त
तीर की जगह एक फूल 
फेंका होता तो तुम्हारे चारों ऒर
खूबसूरत और सुगन्धित फूलों से सजा
एक मधुबन खिल उठा होता । 
लोगों के चेहरे पर मुस्कान होती,
वाणी से अमृत छलकता,
आँखों में प्यार होता और 
अंतस्तल में आत्मीयता का 
सागर हिलोरें ले रहा होता । 
काश .............



साधना वैद

Thursday, June 1, 2017

कमाई



कमाई
जीवन के स्क्वाश कोर्ट में खड़ी हूँ
सोच में डूबी
सारे जीवन गेंद को पूरी ताकत से 
दीवार पर मारती रही ।
तब ताक़त थी न बहुत 
कभी सोचा ही नहीं 
बीच में आने वाला हर व्यक्ति 
इन तीव्र गेंदों के वेग से 
घायल हो रहा है ।
विषैले व्यंग, कटाक्ष, घृणा और धिक्कार 
अपमान, अवमानना, तिरस्कार और उपहास के ज़बरदस्त 
बाउंसर पे बाउंसर मैं फेंकती रही 
और घायल करती रही 
बिन देखे ही कि 
जो घायल हो रहे हैं 
वो मेरे अपने ही हैं । 
आज रिबाउंड होकर वही गेंदें
दुगुने वेग से मेरे पास लौट रही हैं 
मुझे चोटें पहुंचाती 
मुझे घायल करतीं और 
बिलकुल निसंग और एकाकी करतीं ।
क्या कहूँ ! 
जो चोटें आज मुझे मिल रही हैं 
उनसे भी गहरी चोटें 
शायद वो चोटें हैं 
जो अतीत में मैंने 
उन्हें दी थीं । 
उस वक्त जब रिश्तों का पन्ना 
बिलकुल कोरा था 
एक बहुत ही खूबसूरत 
इबारत लिखने के लिए 
मैंने अहंकार और अभिमानवश 
जो कुछ उस पर लिख दिया था 
उसका यही सिला मुझे मिलना 
लाज़िमी था । 
अब गिला कैसा !
यही है मेरे जीवन भर की कमाई ।



साधना वैद

Sunday, May 28, 2017

नसीब की बात



आँसुओं से सींच कर
दिल की पथरीली ज़मीन पर
मैंने कुछ शब्द बोये थे
ख़्वाबों खयालों और
दर्द भरे अहसासों का
खूब सारा खाद भी डाला था
उम्मीद तो कम थी लेकिन
एक दिन मुझे हैरान करतीं
मेरे दिल की क्यारी में
कुछ बेहद मुलायम बेहद खूबसूरत
नर्मो नाज़ुक सी कोंपलें फूट आईं
जिनमें चन्द नज़्में, चंद गज़लें,
चंद कवितायें और चंद गीत
खिल उठे थे ।
मेरा फौलादी बंजर सा मन
अनायास ही मद भरे गुलशन में
तब्दील हो गया ।
ऐसा लगा मैं खुद भी
फूल सी हल्की हो गयी हूँ
और जहान भर की खुशियाँ
मेरे दामन में समा गयी हैं ।
उन रचनाओं की खूबसूरती
उनकी खुशबू और उनकी
नशीली अक्सरियत को मैं
भरपूर जी भी न पाई थी कि
वक्त का हैवान एक दिन
बड़े बड़े डग भरता आया और
बड़ी बेदर्दी से उन कलियों को
रौंदता हुआ निकल गया ।
नसीब अपना अपना !
अब वहाँ वही चंद कुचली हुई
नज़्में, ग़ज़लें, कवितायें और गीत
बिखरे पड़े हैं जिन्हें बटोर कर
सहेजना मेरे लिए
नामुमकिन हो गया है ।

साधना वैद

Sunday, May 21, 2017

भाग्यशाली



तुम्हें शायद नहीं पता
तुम्हारी आँखों का दुराव
तुम्हारी बातों का अलगाव
तुम्हारे व्यवहार का भटकाव
तुम लाख मुझसे छिपाने की
कोशिश कर लो
मेरी समझ में आ ही जाता है !
तुम्हारा बेवजह मुझसे नज़रें चुराना,
मुँह फेर व्यस्तता का दिखावा कर
हूँ हाँ वाले रूखे फीके जवाब देना,
चहरे पर अनायास उग आये
कँटीले तारों के जाल में उलझे रहना   
तुम्हें क्या लगता है ये सब
मेरी नज़र से छिपे रहते हैं ?
सच मानो ये मेरे दिल पर भी
उतनी ही तीव्रता से आघात करते हैं
जितनी गहराई से शायद
तुम्हें चोट पहुँचाते हैं !  
तुम्हारी आवाज़ के हर उतार चढ़ाव से
उसमें मुखर होती हर ऊब,
खीझ और उकताहट से
उसकी हर लरज़, हर कम्पन से
खूब परिचित हूँ मैं भी !
उस वक्त भी जब उसमें मेरे लिए
स्वागत और सम्मान होता है
चिंता और व्यग्रता होती है
प्रेम और निष्ठा निहित होती है
और तब भी जब उसमें मेरे लिए
अलगाव और अनादर होता है
व्यंग और कटाक्ष होता है
उपेक्षा और उपहास होता है !  
अक्सर यह विचार मन में आता है
जो देख नहीं सकते
जो सुन नहीं सकते
वो कितने भाग्यशाली हैं
जीवन की कितनी बड़ी कुरूपता के
अभिशाप से वे बचे हुए हैं !
जीवन के कितने पावन, कितने निर्मल,
कितने शुद्ध सौन्दर्य का
रसपान वे कर पाते हैं !
न कुछ बुरा देखते हैं
न ही सुनते हैं
शायद इसीलिये उनके मन में
अजस्त्र प्रेम की एक निर्मल धारा
सदैव प्रवाहित होती रहती है !
आज इसी बात का अफ़सोस है कि
हम देख सुन क्यों पाते हैं !
जो देख सुन न पाते तो
शायद हम भी उतने ही सुखी होते !

साधना वैद  



Sunday, May 14, 2017

रचना हूँ मैं तेरी माँ

मातृ दिवस पर विशेष 



मिट्टी से हूँ गढ़ी हुई

चौखट में हूँ जड़ी हुई

छाया हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


काँटों के संग उगी हुई

तीक्ष्ण धूप में पगी हुई

कलिका हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


युद्ध भूमि में डटी हुई

सुख सुविधा से कटी हुई

सेना हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


संघर्षों से दपी हुई

कुंदन जैसी तपी हुई

मूरत हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


अंतर्मन पर खुदी हुई

रोम रोम पर रची हुई

कविता हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


सात सुरों से सधी हुई

मीठी धुन में बंधी हुई

  विनती हूँ मैं तेरी माँ !  

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


हर पल मेरे पास है तू

हर पल मेरे साथ है तू

धड़कन है तू मेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !

साधना वैद