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Tuesday, August 22, 2017

कैसे लूँ विदा - रेल हादसा



कैसे लूँ विदा
वादा किया था मैंने
जल्दी आऊँगा

तुम्हारी साड़ी
अम्मा के लिए गीता
साथ लाऊँगा

टूटा है वादा
किसी और पथ पे
मृत्यु ले चली

देख रहा हूँ
कैसे सुख स्वप्नों की
चिता है जली !

बदले रास्ते
बदली है मंजिल
महा प्रयाण

नैनों में बच्चे
अंतर में तुम हो
घर में प्राण

क्षण भंगुर
मानव का जीवन
रोज़ हादसे

बैठे ही रहें
घर में अगर तो
कमायें कैसे

कैसे आ जाता
मौत ले चली मुझे
अपने साथ

जितना मिला
बहुत सुखद था
हमारा साथ

चाहता तो था
चलना साथ तेरे
वक्त न मिला

प्रभु की इच्छा
जब है यही, करें
किससे गिला

माफ़ करना
अधूरी रह गयी
दास्ताँ हमारी

कौन करेगा
देख भाल बच्चों की
चिंता है भारी

भूल किसीकी
खामियाजा भुगतें
यात्री बेचारे

कहाँ सोचा था
लौट के न जायेंगे
घर बेचारे

करते रहे
औरों की रेखा पढ़
भविष्यवाणी

पढ़ न पाए
अपनी रेखाओं की
छिपी कहानी

विदा दो प्रिये
खड़ा है मृत्यु दूत
बिल्कुल पास

दबा है तन  
मलबे में, मन है
तुम्हारे पास

साधना वैद



Sunday, August 20, 2017

विश्वास



‘विश्वास’

कितना आभासी है ना

यह शब्द !

कितना क्षणिक,

कितना छलनामय,

कितना भ्रामक !

विश्वास के जिस धागे से

बाँध कर  

कल्पना की पतंग को

आसमान की ऊँचाइयों तक

पहुँचा कर मन अत्यंत

हर्षित और उल्लसित था

मेरी मुट्ठी में कस कर

लिपटा विश्वास का वह सूत्र

उँगलियों में ही उलझा

रह गया और

किसी और की पतंग

विश्वास के उस धागे को

आसमान में ही काट

मेरी भावना की पतंग को

अनजान वीरानों में

भटकने के लिये

विवश कर गयी !

कैसा था यह विश्वास

जो मन की सारी आस्था

सारी निष्ठा को

निमिष मात्र में हिला गया !  

किस विश्वास पर भरोसा करूँ

काँच से नाज़ुक विश्वास पर या

ओस की बूँद जैसे नश्वर

विश्वास पर ?

सुदूर वीराने से रह रह कर

आती भ्रामक

पुकार की आवाज़ से

विश्वास पर या

आसमान में लुका छिपी का

खेल खेलते टिमटिमाते सितारों की

धुँधली सी रोशनी से

विश्वास पर ?

अनंत अथाह सागर के

सीने पर उठती त्वरित तरंगों से

क्षणिक विश्वास पर या

वृक्ष की हर टहनी पर विकसित

अल्पकालिक सुन्दर सुकोमल

सुगन्धित फूलों के

लघु जीवन से

विश्वास पर ?

जो भी हो ‘विश्वास’ शब्द

जितना सम्मोहक है

उतना ही भ्रामक भी !

दृढ़ होने पर यह जिस तरह  

जीवन जीने के लिये

प्रेरित करता है

टूट जाने पर यह उसी तरह 

जीवन जीने की

सम्पूर्ण इच्छा को ही

पल भर में मिटा जाता है !



साधना वैद  

Friday, August 18, 2017

तुम गाँधी तो नहीं !



ना ना पीछे मुड़ कर ना देखना
क्या पाओगे वहाँ वीभत्स सचाई के सिवा
जिसे झेलना तुम्हारे बस की बात नहीं
तुम कोई गाँधी तो नहीं !  
सामने देखो तुम्हें आगे बढ़ना है
वह रास्ता भी तो आगे ही है
जिसका निर्माण तुमने स्वयं किया है
आगे जलसे हैं, जश्न है, जलवा है
मेवा मिष्ठान्न हैं, पूरी है, हलवा है !
तुम्हारे सामने समूचा सुनहला संसार है
जहाँ आनंद ही आनंद है  
झूठ के कच्चे झिलमिल धागों से
बुना हुआ है तो क्या, है तो खूबसूरत
आँखों को ठंडक, दिल को तसल्ली देता है
मुख पर हँसी, अधरों पर गीत ले आता है
यहाँ तुम्हारा रसूख, रुतबा, रुआब रोज़ बढ़ता है
तुम्हारी शान में दो चार कसीदे रोज़ पढ़ता है ! !
ऐसे में पीछे मुड़ कर कोई देखता है क्या !
और फिर पीछे रखा ही क्या है
जिसे मुड़ कर तुम देखना चाहते हो
वहाँ हैं कड़वे कसैले सत्य के अम्बार
ज़िंदगी से कभी न ख़त्म होने वाली जंग
जद्दोजहद, गरीबी, भुखमरी, बीमारी
बदनीयती, बदहाली, भ्रष्टाचार, और मक्कारी
जो तुम्हारी आत्मा को झिंझोड़ देंगे
तुम्हारी चहरे से हँसी गायब हो जायेगी
आँखों में आँसू भर आयेंगे
दिल का सुकून छिन जाएगा
गीत कंठ ही में घुट जायेंगे
मुझे डर है तुम्हारे अन्दर का
सोया हुआ गाँधी कहीं जाग न जाए
और पल भर में ही तुम्हारा परम सुखदाई
मिथ्या आडम्बर का यह सुनहला संसार
भरभरा कर भूमि पर धराशायी न हो जाए !
बोलो है तुममें इतना आत्मबल,
इतना त्याग, इतना समर्पण और
इतनी संवेदनशीलता कि गाँधी की तरह
सारे सुख त्याग एक धोती में आ जाओ ?
उस समय कम से कम आँखों की
इतनी शर्म तो बाकी थी कि
तमाम विरोधों के बावजूद भी
जीवित रहते बापू सम्मान से जिए
यहाँ तक कि गोली मारने से पहले
हत्यारे ने भी हाथ जोड़ कर उनके प्रति   
अपनी श्रद्धा, अपना सम्मान प्रकट किया !
इस युग में इसकी आशा भी व्यर्थ है
भाषणों में ही सही इतने सालों बाद भी
लोग उनका नाम तो आदर से लेते हैं
लेकिन तुम काल के किस लम्हे में,
किस गह्वर में, कहाँ गुम हो जाओगे
किसीको पता भी नहीं चलेगा
और तुम्हारा नाम ?
तुम्हारे पोते पोतियों को भी याद रहेगा
इसमें भी संदेह है मुझे !
‘गाँधी’ का मुखौटा पहनना आसान है
लेकिन ‘गाँधी’ होना बिलकुल अलग बात है
सोच लो कि तुम्हें क्या करना है ?

साधना वैद    
  


Tuesday, August 15, 2017

* भारत माँ का आर्तनाद *



        १५ अगस्त के उपलक्ष्य में विशेष रचना 

वर्षों की गर्भ यंत्रणा सहने के बाद
सन् १९४७ की १४ और १५ अगस्त में
जब कुछ घंटों के अंतराल पर 
मैंने दो जुडवाँ संतानों को जन्म दिया 
तब मैं तय नहीं कर पा रही थी 
कि मैं अपने आँचल में खेलती
स्वतन्त्रता नाम की इस प्यारी सी 
संतान के सुख सौभाग्य पर 
जश्न मनाऊँ 
या अपनी सद्य प्रसूत
दूसरी संतान के अपहरण पर
सोग मनाऊँ 
जिसे मेरे घर परिवार के कुछ 
विघटनकारी सदस्यों ने ही षड्यंत्र कर 
समाज में वैमनस्य का विष फैला 
मेरी गोद से दूर कर दिया !

तब बापू थे !
उनके कंधे पर सवार हो मेरी नन्ही बेटी ने 
अपनी आँखें खोली थीं 
अपने सीने पर पत्थर रख कर 
मैंने अपनी अपहृत संतान का दुःख भुला 
अपनी इस बेटी को उनकी गोद में डाल दिया था 
और निश्चिन्त होकर थोड़ी राहत की साँस ली थी ! 
लेकिन वह सुख भी मेरे नसीब में 
बहुत अल्पकाल के लिये ही था ! 
३० जनवरी सन् १९४८ को 
बापू को भी चंद गुमराह लोगों ने 
मौत की नींद सुला दिया 
और मुझे महसूस हुआ मेरी बेटी 
फिर से अनाथ हो गयी है 
असुरक्षित हो गयी है ! 

लेकिन मेरे और कितने होनहार बेटे थे 
जिन्होंने हाथों हाथ मेरी बेटी की
सुरक्षा की जिम्मेदारी उठा ली, 
उन्होंने उसे उँगली पकड़ कर 
चलना सिखाया, गिर कर उठना 
और उठ कर सम्हलना सिखाया, 
मैं थोड़ी निश्चिन्त हुई 
मेरी बेटी स्वतन्त्रता अब काबिल हाथों में है 
अब कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकेगा !

लेकिन यह क्या ? 
एक एक कर मेरे सारे सुयोग्य,
समर्पित, कर्तव्यपरायण बेटे 
काल कवलित होते गए 
और उनके जाने बाद 
मेरी बेटी अपने ही घर की 
दहलीज पर फिर से 
असुरक्षित और असहाय,
छली हुई और निरुपाय खड़ी है ! 

क्योंकि अब उसकी सुरक्षा का भार 
जिन कन्धों पर है 
वे उसकी ओर देखना भी नहीं चाहते 
उनकी आँखों पर स्वार्थ की पट्टी बँधी है 
और मन में लालच और लोभ का 
समंदर ठाठें मारता रहता है ! 
अब राजनीति और प्रशासन में 
ऐसे नेताओं और अधिकारियों की 
कमी नहीं जो अपना हित साधने के लिये 
मेरी बेटी का सौदा करने में भी
हिचकिचाएंगे नहीं ! 

हर वर्ष अपनी बेटी की वर्षगाँठ पर
मैं उदास और हताश हो जाती हूँ 
क्योंकि इसी दिन सबके चेहरों पर सजे
नकली मुखौटे के अंदर की 
वीभत्स सच्चाई मुझे 
साफ़ दिखाई दे जाती है 
और मुझे अंदर तक आहत कर जाती है ! 
और मै स्वयम् को 'भारत माता'
कहलाने पर लज्जा का अनुभव करने लगती हूँ !
क्यों ऐसा होता है कि 
निष्ठा और समर्पण का यह जज्बा 
इतना अल्पकालिक ही होता है ?
स्वतन्त्रता को अस्तित्व में लाने के लिये
जो कुर्बानी मेरे अगणित बेटों ने दी 
उसे ये चंद बेईमान लोग 
पल भर में ही भुला देना चाहते हैं ! 
अब मेरा कौन सहारा
यही प्रश्न है जो मेरे मन मस्तिष्क में 
दिन रात गूँजता रहता है 
और मुझे व्यथित करता रहता है !

किसीने सच ही कहा है,
"जो भरा नहीं है भावों से 
बहती जिसमें रसधार नहीं 
वह ह्रदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं !"
मुझे लगता है मेरे नसीब में
अब सिर्फ पत्थर ही पत्थर लिखे हैं ! 

साधना वैद

Saturday, August 12, 2017

यह कैसा विरोध




अपना विरोध और असहमति प्रकट करने का एक अजब ही ट्रेंड चल पड़ा है फेसबुक पर इन दिनों ! विशेष रूप से यदि किसी महिला की आलोचना करनी हो तो लोग बड़े दम ख़म के साथ तैयारी करके न केवल तीखे एवं अपमान जनक ढंग से उस लेखिका और उसकी पोस्ट की बखिया उधेड़ने में लग जाते हैं बल्कि उस पोस्ट को अपनी वाल पर शेयर कर लेते हैं और फिर अपनी ही सोच जैसे तमाम मित्रों को खुले तौर पर आमंत्रित करते हैं कि वे भी आकर उस लेखिका की पोस्ट और उसकी सोच की जी भर कर भर्त्सना करें और उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करें ! यह और बात है कि रचनाकार ने रचना के माध्यम से क्या कहना चाहा है उसका धेला कौड़ी भी उनकी समझ में आया हो या न आया हो !  
ऐसा ही एक वाकया मेरे साथ भी हुआ जब मेरी एक पोस्ट ‘वापिसीपर एक पाठक ने अत्यंत तीखी आलोचना कर मुझे कटघरे में खड़ा कर दिया कि मैं घोर अधर्मी हूँ ! सच बात केवल इतनी थी कि मैंने मंदिर, पूजा और पूजन विधि के बिम्ब को लेकर हमारी सामाजिक व्यवस्था की किसी और विसंगति की ओर इशारा कर अपनी पोस्ट लिखी थी जिसे वे महाशय ना तो समझ ही पाए ना ही स्वीकार कर पाए ! हद तो तब हो गयी जब उन्होंने अपनी वाल पर मेरी पोस्ट को शेयर कर लिया और अपनी जैसी ही रुग्ण मानसिकता वाले अपने कई मित्रों को मेरी पोस्ट पर टीका टिप्पणी के लिए आमंत्रित भी किया ! उनकी एक महिला मित्र ने तो त्वरित प्रतिक्रिया में यहाँ तक कह दिया कि मुझ जैसी लेखिका साहित्य और हिन्दू धर्म के नाम पर कलंक है ! खैर जैसी उनकी क्षुद्र मानसिकता वैसी ही उनकी प्रतिक्रिया ! इस पर चर्चा कर मैं क्यों अपना कीमती समय नष्ट करूं !

जो हुआ सो हुआ लेकिन इन सारी कवायदों के बाद एक बात मेरे मन को गहराई तक कचोटती रही कि स्वयं को आदर्श धर्मावलम्बी सिद्ध करने के लिए क्या सच में हमें अपने धर्म की कुरीतियों, कमियों, और कुप्रथाओं की ओर से आँखें मूँद लेनी चाहिए ? क्या उनका ज़िक्र कर देना ही हमें अधर्मी बना देता है ? जहाँ चिंतन ख़त्म हो जाएगा, जहाँ विमर्श ख़त्म हो जाएगा, जहाँ आत्म निरीक्षण, आत्म परीक्षण और आत्म विश्लेषण ख़त्म हो जाएगा, जहाँ नए विचारों और नयी नीतियों को अपनाने के विरोध में धर्म के तथाकथित झंडाबरदार खंभ ठोक कर तन कर खड़े हो जायेंगे तो वहाँ तो सडांध का पैदा होना अवश्यम्भावी है ! क्या शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुँह घुसा हर गलती हर कमी से आँखें मूँद लेना उचित है ? इसमें कोई संदेह नहीं कि शायद सबसे अधिक धर्म भीरु और आस्थावान होने के बावजूद भी सबसे अधिक गंदे, उपेक्षित और अव्यवस्थित हिन्दुओं के धर्म स्थल ही होते हैं ! यहीं सबसे ज्यादह कर्मकांड किये जाते हैं, अनेकानेक तरह की पूजन की विधियाँ हैं और शायद सबसे अधिक लूट खसोट भी है जिनके निराकरण की ओर किसीका ध्यान नहीं जाता ! उस पर विडम्बना यह है कि अपनी इन विधियों पद्धतियों पर सबसे अधिक गर्व भी हमें ही है ! जोर शोर से धर्म का डंका पीटने से हम कभी पीछे नहीं हटते और हर किस्म की गन्दगी से आँखें मूँदे स्वयं को महिमा मंडित करते रहने से ज़रा सा भी नहीं चूकते ! किस भुलावे में हम हैं यह मेरी समझ से परे है !

आपके सामने चंद दृष्टांत रखना चाहती हूँ जो मेरी आँखों के सामने ही घटित हुए हैं ! बद्रीनाथ के मंदिर में मैंने स्वयं वहाँ के व्यवस्थापकों को त्वरित दर्शन कराने के एवज़ में दर्शनार्थियों से २०००/- रुपये की रिश्वत की माँग करते हुए देखा है ! हुआ यूँ कि दर्शन हेतु लम्बी लाइन में घंटों से लोग खड़े हुए थे ! चींटी की रफ़्तार से लाइन आगे सरक रही थी ! हमसे आठ दस लोग आगे बड़ी दूर से आये एक दम्पत्ति भी उसी लाइन में लगे हुए थे ! उनको शायद उसी शाम अपने शहर वापिस लौटना था ! शाम की ट्रेन से वापिसी का रिज़र्वेशन था ! समय कम रह गया था इसलिए उन्होंने जो पुजारी व्यवस्था देख रहा था उससे कुछ जल्दी दर्शन करवा देने की अपनी अभिलाषा और समयाभाव की विवशता व्यक्त की ! पुजारी जी ने त्वरित दर्शन कराने की एवज़ में २००० रुपयों की माँग रख दी ! दर्शनार्थी ने जब इतने रुपये देने में अपनी असमर्थता जताई तो कुपित होकर उस पुजारी ने श्राप देकर कहा ,”भगवान् के दर्शन के लिए रुपयों का मोह कर रहे हो जाओ तुम्हारा कभी भला नहीं होगा !बताइये जो इंसान ईश्वर की कृपाकांक्षा के लिए सौ तरह की व्यवस्थाएं कर और अनेकों तकलीफें उठा अपने घर से इतनी दूर गया है तो उसके मन में प्रबल आस्था और भक्ति होगी तब ही गया होगा न ! कैसा लगा होगा उसे यह सब सुन कर ! हो सकता है उसके पास इतने पैसे हों ही नहीं ! यह हाल है हमारे तीर्थस्थलों का !

हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में अत्यधिक भीड़ में दम घुटने से महिला को बेहोश होते और अव्यवस्था और गन्दगी के चलते मंदिर की सीढ़ियों से फिसल कर एक व्यक्ति को परदेस में अपनी हड्डियाँ तुड़ाते हुए भी मैंने देखा है ! गया जी, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, हरिद्वार, प्रयाग कहीं भी चले जाइए पण्डे किस तरह जिजमान का खून चूसते हैं इस अनुभव से आप में से अनेकों लोग गुज़र चुके होंगे ! सब जानते हैं कि मंदिरों में जो हार, चुनरी और नारियल चढ़ाए जाते हैं वही बैक डोर से फिर से बिकने के लिए बाहर दुकानों पर आ जाते हैं ! कितनों के पर्स, चेन, रुपये, घड़ियाँ, जूते चप्पल मंदिरों में गायब हो जाते हैं ! गर्भगृह में भगवान् की पूजा के समय जिस प्रकार से जल, दूध, पुष्प इत्यादि चढ़ाए जाते हैं और वहाँ पर तमाम फिसलन, गन्दगी और कीचड़ हो जाती है इसकी साफ़ सफाई की ओर किसीका ध्यान नहीं जाता ! भीड़ भाड़ की वजह से अक्सर दर्शनार्थी फिसल कर गिर जाते हैं और चोट खा जाते हैं ! मुझे भगवान से कोई बैर नहीं है ना ही उनके प्रति अश्रद्धा है ! लेकिन इस पकार की अव्यवस्थाओं से असंतोष अवश्य है ! ऐसा सिर्फ मंदिरों में ही क्यों होता है ! किसी भी गुरुद्वारे में, चर्च में, या मस्जिद में चले जाइए इस तरह की अव्यवस्था वहाँ तो नहीं दिखाई देती ! ना कोई शोर शराबा होता है, न कोई कर्मकांड और ना ही कोई लूट खसोट ! तो क्या अपने ईश्वर के प्रति उनकी आस्था हम हिन्दुओं से कम है ? या हमें बहुत अधिक पुण्य मिल जाता है और उन्हें कम ? या हम बहुत उच्च कोटि के भक्त हैं और वे निम्न कोटि के ? हर गली मोहल्ले में जहाँ कहीं भी जुगत लग जाती है भगवान् की कोई भी फोटो या मिट्टी की मूर्ति रख कर, दो अगरबत्ती जला कर और दो फूल चढ़ा कर पूजा का स्थान बना दिया जाता है ! यह भी देखने की कोशिश नहीं करते कि वह स्थान कितना साफ़ है ! मैंने घूरे पर चोरी की बिजली का कनेक्शन लेकर भगवान् का मंदिर बनाते हुए स्वयं अपनी आँखों से बस्ती के लोगों को देखा है ! रोकने टोकने का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता ! तुरंत ही लोगों की धार्मिक आस्थाएं ‘आहत’ हो जाती हैं और वे बलवा करने पर उतारू हो जाते हैं ! मंदिर के पीछे घूरे के ऊँचे ढेर पर कुत्ते घूमते रहते हैं और भगवान् के प्रसाद को सफाचट कर जाते हैं इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता ! रोज़ का जेबखर्च जो निकल आता है ! मैंने इस पर एक पोस्ट भी लिखी थी –

 “अपना देश महान - घूरे पर भगवान्” ! लिंक इस प्रकार है -

 http://sudhinama.blogspot.in/2015/06/blog-post_19.html

क्या यह सब करते हुए हमारे धर्म का अपमान नहीं होता ? इस तरह गली मोहल्लों में, घूरे पर, या पेड़ों के नीचे आप लोगों ने कभी किसी गुरुद्वारे, चर्च या किसी मस्जिद की कोई शाखा उप शाखा देखी है ?

आप स्वयं विचार करें और जिस किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचें कृपया मुझे भी अवश्य अवगत करायें ताकि मैं भी अपनी शंकाओं का निवारण कर सकूँ और स्वयं को सुधार कर सही कर सकूँ ! आभार होगा आपका !



साधना वैद 

Tuesday, August 8, 2017

क्या सज़ा मिले ऐसे लोगों को !




किसी भी दिन का, किसी भी प्रदेश का, किसी भी शहर का समाचार पत्र उठा लीजिये ! बलात्कार, दुष्कर्म, हिंसा और ह्त्या की घिनौनी वारदातों से अखबार रँगे रहते हैं ! इस तरह की घटिया गतिविधियों में समाज के हर वर्ग के लोग संलिप्त पाए जाते हैं ! जो बड़े हाई प्रोफाइल लोग होते हैं, नेताओं, अभिनेताओं, उद्योगपतियों या मंत्रियों की श्रेणी के, अक्सर तो उनकी करतूतें उजागर ही नहीं हो पातीं और अगर पीड़िता के ‘दुस्साहस’ की वजह से कभी प्रकाश में आ भी गयीं तो परिवार, प्रशासन, मीडिया, और सारी मशीनरी रुतबा, रसूख और ओहदे का दुरुपयोग कर धन दौलत को पानी की तरह बहा एड़ी चोटी का ज़ोर लगा देते हैं और बात को दबाने में और सबूतों को मिटाने में लग जाते हैं ! 

मध्यम वर्ग या निम्न वर्ग के लोग ही अक्सर पकड़ाई में आ जाते हैं तो वे भी हमारी न्याय व्यवस्था की कछुआ चाल और लचर कानूनों का फ़ायदा उठा वर्षों क़ानून की गिरफ्त से बाहर रह मौज की ज़िंदगी बसर करते रहते हैं और इसी तरह की असामाजिक गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं ! जिन्हें निचली अदालतों से सज़ा मिल जाती है वे उच्च न्यायालय में अपील करने के अधिकार का फ़ायदा उठा फिर कई सालों के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं और नासूर बन अपने आस पास के वातावरण और परिवेश को प्रदूषित करते रहते हैं ! इन बातों से समाज में ग़लत सन्देश जाते हैं और इसी वजह से ऐसे कुत्सित विचारों के लोगों के मन में किसी किस्म का न तो भय रहता है ना ही इस प्रकार की घटनाओं में कमी आ पाती है !

अब सवाल यह उठता है कि कौन सा तरीका अपनाया जाए कि ऐसे लोगों की अंतरात्मा जागे और ये किसी तरह सद्मार्ग पर चलने के लिए तैयार हो सकें ! मुझे तो इस समस्या का एक ही निराकरण कारगर दिखाई देता है कि ऐसे लोगों की प्राणवायु की आपूर्ति बंद कर दी जानी चाहिए ! इस तरह की मानसिकता के लोगों की प्राणवायु है इनका परिवार ! जो हर हाल में इनके लिए ढाल बन कर खडा हो जाता है ! इनके कुकर्मों को छिपाने के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने को और अपने बैंक बेलेंस को निचोड़ कर सड़क पर आ खड़े होने से भी पीछे नहीं हटता ताकि समाज में दुश्चरित्र बेटे के बरी हो जाने से उनकी झूठी शान बनी रहे ! लेकिन मेरे विचार से यह ग़लत है ! आज की दुनिया में लोग इतने आत्मकेंद्रित हो गए हैं कि बाहर के लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं क्या कहते हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ! “कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना” गीत को दोहरा कर वे अपने अपराधी चहरे पर सज्जन और शरीफ इंसान का मुखौटा चढ़ाए घुमते रहते हैं ! लेकिन जब ऐसे दुश्चरित्र लोगों की भर्त्सना और बहिष्कार उनके अपने घर परिवार के लोग करेंगे और उन्हें परिवार के सदस्य के रूप में अमान्य कर उनके सारे अधिकार उनसे छीन लेंगे तभी कुछ सुधार होने की संभावना है ! 

समाज के लोग चाहे जितनी आलोचना करें घर के लोग ज़मीन आसमान एक कर उन्हें बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं जिसकी वजह से ऐसी रुग्ण मानसिकता के लोगों के रवैये में कभी सुधार नहीं आता और यही वजह है कि इस तरह के अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं ! घर वालों का सहयोग और सपोर्ट मिल जाता है तो ऐसे दुश्चरित्र लोग शेर हो जाते हैं ! आस पड़ोस की या बाहर वालों की किसे चिंता होती है ! अपने देश की न्यायिक प्रक्रिया की कछुए जैसी चाल के बारे में तो सबको पता ही है ! सालों गुज़र जाते हैं और फैसले नहीं आते ! निर्भया के केस को ही ले लीजिये ! और मामलों की बनिस्बत इसे बहुत जल्दी निपटाया गया ! सज़ा भी घोषित कर दी गयी लेकिन अभी तक उसके अपराधी ज़िंदा हैं और इस समय भी उनकी तुच्छ और कुत्सित सोच ज़रूर किसी न किसी कुचक्र में ही लगी होगी कि कैसे फांसी के फंदे से बचा जाए ! समाज में वास्तविक बदलाव तभी आ पायेगा जब घर वाले ऐसे लोगों का परित्याग करेंगे और उन्हें दण्डित करेंगे ! जब घर वालों से ऐसे लोगों को तिरस्कार मिलेगा तो उनका रक्षा कवच टूट जाएगा और तब शायद उन्हें शर्मिन्दगी का अहसास हो ! ऐसा मेरा मानना है !

इस सन्दर्भ में मैंने दो कवितायें भी लिखी हैं जो फेसबुक और मेरे ब्लॉग ‘सुधीनामा’ पर उपलब्ध हैं ! 
मेरे ब्लॉग की लिंक इस प्रकार है - 

http://sudhinama.blogspot.in/

मेरी दोनों रचनाओं की लिंक नीचे दी है मैंने !

http://sudhinama.blogspot.in/2013/01/blog-post_18.html
http://sudhinama.blogspot.in/2017/08/blog-post.html

आपसे अनुरोध है आप इन्हें भी अवश्य पढ़ें ! ऐसे दुश्चरित्र लोगों के माता पिता भी इसी समाज का हिस्सा है ! उनका भी समाज के प्रति कुछ दायित्व है ! वे कैसे अपने कपूतों को इस तरह बचाने की कोशिश कर सकते हैं ! उनकी अपनी परवरिश और शिक्षा पर भी सवाल उठते हैं कि उन्होंने कैसे संस्कार दिए अपने बेटों को कि वे सबके लिए भय और आतंक की वजह बन गए ! इस सन्दर्भ में नए क़ानून भी बनाने चाहिए ! पैतृक संपत्ति में उसका उत्तराधिकार समाप्त कर दिया जाना चाहिए ! कहीं भी उसे नौकरी नहीं मिलनी चाहिए ! और समाज के अन्य लोग ऐसे लोगों से सतर्क और सावधान रहें इसके लिए उनके फ़ोटोज़ सोशल मीडिया पर अक्सर सार्वजनिक किये जाने चाहिए !  

समाज में व्याप्त इस गन्दगी को तभी हटाया जा सकेगा जब उनके अपने परिवार के लोग ऐसे कुसंस्कारी और दुश्चरित्र लोगों का बहिष्कार करेंगे ! वरना तो बाहर के लोग क्या कहते हैं इसकी चिंता किसे होती है ! माता पिता भाई बहनों का मुँह मोड़ लेना उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ जाएगा और जब कहीं से भी आर्थिक और भावनात्मक सपोर्ट उन्हें नहीं मिलेगा तो शायद उनके मन में सच्चे पश्चाताप के बीज अंकुरित हों और वास्तविक सुधार की दिशा में उनके कदम अग्रसर हों ! ऐसा मेरा मानना है ! आपकी क्या राय है इस विषय में यह भी जानना चाहती हूँ !


साधना वैद