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Friday, August 6, 2010

* मैं तट हूँ ! *

मैं तट हूँ !

मैंने उजली धुँधली सुबहों में
हमेशा ही निरीह भूले
बच्चे की तरह मचलते सागर को
अपनी बाहों का आश्रय देकर
दुलारा है, प्यार किया है,
उसको उल्लसित किया है
फिर क्यों
जग मेरी उपेक्षा करता है !

जब भी भरपूर चाँदनी रातों में
विव्हल, व्याकुल होकर
सागर ने मेरे वक्ष पर
अपना सिर पटका है
मैंने हमेशा उसे
अपने अंक में समेट
प्यार से थपथपा कर
आश्वस्त किया है,
सांत्वना दी है !
फिर क्यों
जग मेरी भावनाओं से
अनजान बना रहता है !

जब जब अमर्यादित,
उच्श्रंखल होकर सागर ने
भीषण अट्टहास किया है,
अपनी विध्वंसक प्रवृत्ति
से सब कुछ तहस-नहस
कर डालने का
दुस्साहस किया है
मैंने उसके रौद्र रूप के
हर प्रहार को
अपने तन पर झेला है,
अपनी सीमाओं को
और विस्तृत कर दिया है
ताकि वह शांत हो जाए
और उसके क्रोध का आवेग
कम हो जाए !
फिर जग क्यों यह सब
अनदेखा करता है !

जो आता है वह
सागर की सुषमा से
सम्मोहित होता है,
उसकी लोल लहरों की लीला
उन्हें लुभाती है,
अरुण रश्मियों का
पानी में झिलमिलाता
प्रतिबम्ब उन्हें मन्त्रमुग्ध
करता है !
मेरा अस्तित्व क्या सिर्फ
पैरों तले रौंदे जाने
के लिये ही है ?
या मेरे तन पर सजे
शंख, सीपी नोचे जाने
के लिये है ?

सदियों से मैंने हर आगंतुक की
अभ्यर्थना और स्वागत
ही किया है !
चाहे वह
यात्री हो या सैनिक,
व्यापारी हो या पर्यटक,
शत्रु हो या मित्र
मेरे प्रेम का इस तरह
तिरस्कार क्यों ?
क्या मैं सिर्फ
लोगों की चरण रज
बन जाने के लिये ही
अस्तित्व में हूँ ?
मेरा अपना कोई
महत्व नहीं ?
क्योंकि
मैं केवल तट हूँ !

साधना वैद