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Friday, August 20, 2010

* क्या यह कसूर मेरा है *

मेरे प्यारे दोस्त राम
बहुत भरे दिल से
आज यह खत तुम्हें लिखा है !
लहरा तो रहा है दुःख का समंदर दिल में
लेकिन बहुत थोड़ा सा यहाँ दिखा है !

आज मैं तुमसे हमारे
बेहद पाक रिश्ते का हिसाब माँगता हूँ !
जिन्हें सोच-सोच कर मेरा दिमाग थक गया है
उन सवालों के जवाब माँगता हूँ !

मेरी अम्मी ने मुझे बताया था
जब तुम्हारा जन्म हुआ था
तो उन्होंने अपने घर में जोर-जोर से थाल बजा कर
तुम्हारे होने का शगुन मनाया था !

और जब मैं पैदा हुआ था
तो तुम्हारी मम्मी ने शहर के हर मंदिर में जा
प्रसाद चढाया था और ढेरों दान दक्षिणा दे
गरीब भिखारियों को खाना खिलाया था !

मैं वही रहीम हूँ आज भी
तुम्हारा दोस्त, तुम्हारा हमराज़, तुम्हारा भाई
फिर किसने ये दीवार खींची
और किसने खोदी ये खाई ?

क्या तुम भूल गए हर होली पर
सबसे पहली गुजिया
तुम्हारी मम्मी मुझे ही खिलाती थीं,
और हर ईद पर मेरी अम्मी
मुझसे भी ज्यादह ईदी
तुम्हें और तुम्हारी दीदी को दिलाती थीं ?

मेरे अब्बा से मिलने उनका कोई रिश्तेदार
दूसरे मुल्क से आया
क्या यह कसूर मेरा है ?
उसके वापिस जाने के बाद
शहर में धमाके हो गए
क्या यह कसूर मेरा है ?

यह महज एक इत्तिफाक भी तो हो सकता है
किसी और का हो तो हो
तुम्हारा विश्वास मेरे अब्बा पर
और मुझ पर कैसे डिग सकता है ?

अगर ऐसा नहीं है तो
फिर क्यों मेरे घर आने पर
तुम सबके चहरे
पत्थर की तरह खामोश हो जाते हैं,
आँखों में पहले सा प्यार नहीं छलकता
बोलों में गैरियत और
रुखाई के अक्स नज़र आते हैं ?

हम सब साथ खेले, पले, बड़े हुए
फिर अब ऐसा क्या हो गया
तुम सबके शक और नफ़रत की वजह
मेरा घर में आना ही हो गया !

जिस दीदी को हिफाज़त से
घर लाने के लिये
तुम्हारी मम्मी ने मुझे
अक्सर कॉलेज भेजा है
उसी दीदी को शायद
मेरी ही बद नज़र से बचाने के लिये
आज तुम्हारी मम्मी ने
आँख के इशारे से घर के अंदर भेजा है !

बोलो राम
इतने वर्षों के साथ के बाद
क्या आज मुझे
अपनी वफादारी अपनी शराफत
तुम्हारे सामने फिर से
साबित करनी होगी ?
सालों की हमारी
पाक साफ़ दोस्ती की इबारत
एक बार फिर नए सिरे से
बिलकुल शुरू से लिखनी होगी ?

मैंने हर सुख-दुःख में
तुम्हारा साथ निभाया है
तुम्हें भी अपने हर
खुशी और गम में शरीक पाया है
फिर तुमने कैसे यह सब कबूल कर लिया ?
क्या सिर्फ इसलिए कि
तुम 'राम' हो और मैं 'रहीम'
क्या महज़ इस फर्क ने ही
हमें इतनी दूर कर दिया ?

साधना वैद