Followers

Sunday, January 16, 2011

उड़ चला मन

इन्द्रधनुषी आसमानों से परे,
प्रणय की मदमस्त तानों से परे,
स्वप्न सुख के बंधनों से मुक्त हो,
कल्पना की वंचनाओं से परे,
उड़ चला मन राह अपनी खोजने,
तुम न अब आवाज़ देकर रोकना !

चन्द्रमा की ज्योत्सना का क्या करूँ,
कोकिला के मधुर स्वर को क्यों सुनूँ,
चाँदनी का रूप बहलाता नहीं,
मलय का शीतल परस भी क्यों चुनूँ ,
उड़ चला मन आग प्राणों में लिये,
तुम न पीछे से उसे अब टोकना !

आँधियों का वेग उसको चाहिये,
ज्वार का आवेग उसको चाहिये,
ध्वंस कर दे जो सभी झूठे भरम,
बिजलियों की कौंध उसको चाहिये,
उड़ चला मन दग्ध अंतर को लिये,
तुम न उसकी राह को अब रोकना !

निज ह्रदय की विकलता को हार कर,
विघ्न बाधाओं के सागर पार कर,
भाग्य अपना बंद मुट्ठी में लिये,
चला जो अविरल नुकीली धार पर,
उड़ चला मन ठौर पाने के लिये,
तुम न उस परवाज़ को अब टोकना !

साधना वैद