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Sunday, January 30, 2011

चूक

कहीं तो चूक हुई है
वरना वर्षों से अंतरतम के निर्जन कोने में
संकलित, संग्रहित निश्च्छल प्रार्थनाएं
सुने बिना ही देवता यूँ रूठ न जाते
और वे पल भर में ही निष्फल ना हो जातीं !

कहीं तो चूक हुई है
वरना अंजुली में सजी चमकीली धूप
उँगलियों से छिटक कर अचानक ही यूँ
सर्द हवाओं में विलीन ना हो जाती
और मेरी हथेलियाँ यूँ रीती ना हो जातीं !

कहीं तो चूक हुई है
वरना पल भर के लिये ही सही
दिग्दिगंत को आलोक से जगमगा देने वाले
त्वरा के प्रकाश को मेरे नयन आत्मसात कर पाते
इससे पहले ही मेरी पलकें मुँद न जातीं !

कहीं तो चूक हुई है
वरना हृदय में सदियों से संचित
नन्हीं-नन्हीं, नादान, भोली, सुकुमार आशाएं
प्रतिफलित होने से पहले ही इस तरह
मेरे मन में ही दम ना तोड़ देतीं !

कहीं तो चूक हुई है
वरना तेरी खुशबू, तेरे अहसास, तेरे वजूद
को मैं जी पाती इससे पहले ही जीवन की गाड़ी
किसी और राह पर ना मुड़ जाती !

साधना वैद