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Tuesday, February 15, 2011

कल रात ख्वाब में

कल रात ख्वाब में
मैं तुम्हारे घर के कितने पास
पहुँच गयी थी !
तुम्हारी नींद ना टूटे इसलिये
मैंने दूर से ही तुम्हारे घर के
बंद दरवाज़े को
अपनी नज़रों से सहलाया था
और चुपके से
अपनी भीगी पलकों की नोक से
उस पर अपना नाम उकेर दिया था !
सुबह को जब तुमने दरवाजा खोला होगा
तो उसे पढ़ तो लिया था ना ?

तुम्हारे घर की बंद खिड़की के बाहर
मैंने अपने आँचल में बंधे
खूबसूरत यादों के सारे के सारे पुष्पहार
बहुत आहिस्ता से नीचे रख दिये थे !
सुबह उठ कर ताज़ी हवा के लिये
जब तुमने खिड़की खोली होगी
तो उनकी खुशबू से तुम्हारे
आस पास की फिजां
महक तो उठी थी ना ?

तुम्हारे घर के सामने के दरख़्त की
सबसे ऊँची शाख पर
अपने मन में सालों से घुटती एक
लंबी सी सुबकी को
मैं चुपके से टाँग आई थी
इस उम्मीद से कि कभी
पतझड़ के मौसम में
तेज़
हवा के साथ
उस दरख़्त के पत्ते उड़ कर
तुम्हारे आँगन में आकर गिरें तो
उनके साथ वह सुबकी भी
तुम्हारी झोली में जा गिरे !

तुम अपने बगीचे की क्यारी में
पौधे रोपने के लिये जब
मिट्टी तैयार करोगे तो
तुम वहाँ मेरे आँसुओं की नमी
ज़रूर महसूस कर पाओगे
शायद मेरे आँसुओं से सींचे जाने से
तुम्हारे बाग के फूल और स्वस्थ,
और सुरभित, और सुन्दर हो जायें !

अपने मन में उठती भावनाओं को
गीतों में ढाल कर मैंने
खामोशी के स्वरों में
मन ही मन दोहरा लिया था !
कहीं मेरी आवाज़ से, मेरी आहट से
तुम्हारी नींद ना टूट जाये
मैं चुपचाप दबे पाँव वापिस लौट आई थी !
मेरे वो सारे गीत सितारे बन के
आसमान में चमक रहे हैं
तुम जब आसमान में देखोगे
तो हर तारा रुँधे स्वर में
तुमसे मेरी ही बात करेगा
तुम उन बातों को समझ तो पाओगे ना ?

साधना वैद