Followers

Thursday, April 14, 2011

ईश्वर और इंसान

जापान के सन्दर्भ में आज यह रचना प्रस्तुत कर रही हूँ ! मेरी यह रचना उन विपदाग्रस्त लोगों को समर्पित है जो दुर्भाग्य से जानलेवा एटोमिक रेडियेशन का शिकार हुए हैं पूर्व में भी एवं वर्तमान में भी !






एक सूर्य सृष्टि नियन्ता ने रचा
सुदूर आकाश में,
दूसरा सूर्य इंसान ने रचा
वेधशाला में !
ईश्वर ने जो सूर्य रचा
उसने सृष्टि को जीवन दिया
मानव ने जो सूर्य रचा
उसने सृष्टि नियंता की रचना में
व्याघात पैदा किये और जन्म दिया
ऐसी विनाशलीला को
जिसने इस सुन्दर धरती से
सारे सौंदर्य को जड़ से समाप्त कर देने में
कोई कसर ना छोड़ी !
अविवेकी इंसान की इस मानसिकता की
साक्षी है यह समस्त सृष्टि
और साक्षी है उस
विकराल विनाशकारी विध्वंस की
जो पल भर में ही
जला कर राख कर गया
सदियों से संचित
एक अति समृद्धशाली सभ्यता को |
पेड़ों को पौधों को,
फूलों को रंगों को,
सौरभ को सौंदर्य को,
पंछी को कलरव को,
पिता को पुत्र को,
माँ को माँ जायों को,
सारे के सारे इंसानों को
और इंसानियत को ।
और दे गया एक बदनुमा उपहार
आने वाली तमाम पीढ़ियों को
विकलांगता और विक्षिप्तता का,
बदहाली और बेचारगी का !
क्या इसी उपलब्धि के लिये
रचा था तुमने यह सूरज ?
क्या यही था तुम्हारा अभीष्ट इस सूरज से ?
ईश्वर रचित सूरज सबको जीवन देता है
और मानव रचित सूरज ?
वह जीवन देता नहीं जीवन लेता है,
अगर पड़ जाये अविवेकी हाथों में ।
क़ैसी विडम्बना है !
यही फर्क है ईश्वर और इंसान में ।

साधना वैद