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Tuesday, April 19, 2011

कठपुतलियाँ


अब तक इतने सालों से

कठपुतलियाँ ही तो नचाती आई हूँ ,

मजबूती से उनकी डोर

अपनी उँगलियों में लपेटे-लपेटे

हर रोज वही सदियों पुरानी कहानी

और सदियों पुराना तमाशा ही

तो दिखाती आई हूँ !

यह देखो उनकी डोर से

मेरी उँगलियाँ घायल होकर

किस तरह रक्तरंजित हो गयी हैं ,

और वही बोल, वही गीत, वही कहानी

सुनाते-सुनाते मेरी सारी

संवेदनाएं भी सो गयी हैं !

‘ओहोजी आगे चलो’, ‘ओहोजी पीछे चलो’ ,

‘ओहोजी घूम के नाचो’, ‘ओहोजी झूम के नाचो’

ओहो जी झुक के सबको सलाम करो’,

‘चलो अब सो जाओ’,

सारे उल्लास उत्साह के भाव तो

बस मेरी आवाज़ के उतार चढ़ाव में होते हैं ,

भावनाहीन निर्जीव पात्र तो महज़

मेरे हाथों की कठपुतलियाँ होते हैं !

वही चमकते जोड़े में सजी रानी की शादी

वही हाथी, घोड़े, ऊँटों से सजी बरात

वही राजा का पराक्रम दिखा

रानी को युद्ध में जीत कर ले आना ,

वही अन्य सभी कठपुतलियों का

ढोल ताशे की लय पर जोश के साथ

शादी के गीतों को झूम-झूम कर गाना !

भावनाओं के आवेग पर

कस कर डाट लगा मैं

सालों से इसी तरह रोते को हँसाती

और हँसते को रुलाती आ रही हूँ ,

पता नहीं कठपुतलियाँ मुझे नचा रही हैं

या मैं कठपुतलियों को नचा रही हूँ !

साधना वैद