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Sunday, May 15, 2011

अहसास








मन के सूने गलियारों में किसीकी

जानी पहचानी परछाइयाँ टहलती हैं ,

दिल की सख्त पथरीली ज़मीन पर

दबे पाँव बहुत धीरे-धीरे चलती हैं !

पलकों के बन्द दरवाज़ों के पीछे

किसीके अंदर होने का अहसास मिलता है ,

कनखियों की संधों से अश्कों की झील में

किसीका अक्स बहुत हौले-हौले हिलता है !

हृदय के गहरे गह्वर से कोई पुकार

कंठ तक आकर घुट जाती है ,

कस कर भिंचे होंठों की कंपकंपाहट

बिन बोले ही बहुत कुछ कह जाती है !

किसीका ज़िक्र भर क्यों मन के

शांत सागर में सौ तूफ़ान उठा जाता है ,

मैं चाहूँ या ना चाहूँ क्यों मेरे स्वत्व को

नित नयी कसौटियों पर कस जाता है !



साधना वैद