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Monday, June 13, 2011

मौन की दीवारें







मौन की दीवारों से

टकरा कर लौटती

अपनी ही आवाज़ों की

बेचैन प्रतिध्वनियों को

मैं खुद ही सुनती हूँ ,

और अपनी राहों में बिछे

अनगिनती काँटों को

अपनी पलकों से

खुद ही चुनती हूँ !

अपनी चंद गिनी चुनी

अभिलाषाओं, इच्छाओं,

भावनाओं, अभिव्यक्तियों

पर कभी ना खुलने वाले

तुम्हारे दमन के

आतातायी ताले की

आक्रामकता को

मैं चुपचाप सहती हूँ ,

और अपनी

अकथनीय वेदना की

दुख भरी कहानी

निर्वासन के एकांत पलों में

खुद से ही कहती हूँ !

अपने मन के निर्जन,

नि:संग कारागार में

दीवारों पर सर पटकती

वर्षों से निरुद्ध अपनी

व्यथित अंतरात्मा को

अपनी ही बाहों का

संबल दे अपने अंक में

असीम दुलार से

स्वयं ही समेट लेती हूँ ,

और घायल होती

अपनी चेतना को

अपने जर्जर शीतल

आँचल की छाँव में

मृदुल स्पर्श से सहला

खुद ही लपेट लेती हूँ !


साधना वैद !


चित्र गूगल से साभार -