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Tuesday, December 6, 2011

एक सच

जाने क्यों

आज सारे शब्द चुप हैं ,

सपने मूर्छित हैं ,

भावनायें विह्वल हैं ,

कल्पनाएँ आहत हैं ,

गज़लें ग़मगीन हैं ,

इच्छाएं घायल हैं ,

अधर खामोश हैं ,

गीतों के सातों

स्वर सो गये हैं

और छंद बंद

लय ताल सब

टूट कर

बिखर गये हैं !

मेरे अंतर के

चिर परिचित

निजी कक्ष के

नितांत निर्जन,

सूने, नीरव,

एकांत में

आज यह कैसी

बेचैनी घिर आई है

जो हर पल व्याकुल

करती जाती है !

कहीं कुछ तो टूटा है ,

कुछ तो बिखर कर

चूर-चूर हुआ है ,

जिसे समेट कर

एक सूत्र में पिरोना

मुश्किल होता

जा रहा है !

मुझे ज़रूरत है

तुम्हारी मुट्ठी में

बँधी उज्ज्वल धूप की ,

तुम्हारी आँखों में

बसी रेशमी नमी की ,

तुम्हारे अधरों पर

खिली आश्वस्त करती

मुस्कुराहट की ,

और तुम्हारी

उँगलियों के

जादुई स्पर्श की !

क्योंकि मेरे मन पर

छाये हर अवसाद का

घना कोहरा तभी

छँटता है

जब मेरे मन के

आकाश पर

तुम्हारा सूरज

उदित होता है !

साधना वैद