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Wednesday, December 14, 2011

सपने


रफ्ता-रफ्ता सारे सपने पलकों पर ही सो गये ,

कुछ टूटे कुछ आँसू बन कर ग़म का दरिया हो गये !


कुछ शब की चूनर के तारे बन नज़रों से दूर हुए ,

कुछ घुल कर आहों में पुर नम बादल काले हो गये !


कुछ बन कर आँसू कुदरत के शबनम हो कर ढुलक गये ,

कुछ रौंदे जाकर पैरों से रेज़ा रेज़ा हो गये !


कुछ दरिया से मोती लाने की चाहत में डूब गये ,

कुछ लहरों ने लीले, कुछ तूफ़ाँ के हवाले हो गये !


कुछ ने उड़ने की चाहत में अपने पर नुचवा डाले ,

कुछ थक कर अपनी ही चाहत की कब्रों में सो गये !


कुछ गिर कर शीशे की मानिंद चूर-चूर हो बिखर गये ,

कुछ जल कर दुनिया की तपिश से रेत का सहरा हो गये !


अब तक जिन सपनों के किस्से तहरीरों में ज़िंदा थे ,

क़ासिद के हाथों में पड़ कर पुर्ज़ा-पुर्ज़ा हो गये !


अब इन आँखों को सपनों के सपने से डर लगता है ,

जो बायस थे खुशियों के रोने का बहाना हो गये !



साधना वैद