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Saturday, July 30, 2011

एक अकम्पित लौ


तुम्हारी यादों का सिरहाना लगाये,

तुम्हारे ख्यालों की चादर को

कस कर अपने जिस्म से लपेटे,

तुम्हारी छवि को आँखों में बसाये,

तुम्हारी बातों की रातरानी सी

महकती भीनी-भीनी खुशबू की

स्मृति से मन प्राण को

आप्लावित कर,

तुम्हारी आवाज़ के अमृत से

अपनी आत्मा को सींचती हूँ !

जाने कितने मुकाम उम्र के

अब तक पार कर लिये हैं

याद नहीं !

किसी मंदिर में प्रज्वलित

अखण्ड ज्योति की तरह

अपने मन के निर्जन कक्ष में

शाश्वत अकम्पित लौ की तरह

मैं सदियों से हर पल

हर लम्हा आज भी प्रदीप्त हूँ

कभी ना बुझने के लिये

और हर क्षण राख बन

स्वयं को उत्सर्जित

करने के लिये !



साधना वैद

Tuesday, July 26, 2011

कश्ती


विचारों की सरिता में

कविता की कश्ती को

भावनाओं के बहाव की दिशा में

मैं शब्दों की पतवार से खेती

आगे बढ़ी जाती हूँ

इस प्रत्याशा में कि

चाँद सितारे, परिंदे पहाड़,

फूल तितलियाँ, झील झरने,

नदिया सागर, सारी की सारी कायनात,

सूर्योदय और सूर्यास्त ,

सुबह, दोपहर और शाम ,

गहन अंधेरी रातें और चमकीली उजली भोर

सारे इन्द्रधनुषी रंग, और तमाम

कोमल से कोमलतम खयालात,

सारा प्यार और सौंदर्यबोध,

सारा दर्द और संवेदना

और ‘तुम’ मेरी इस नौका में

आकर बैठ जाओगे और

मेरी यह कश्ती

‘नोआ’ की नाव की तरह

रचना के सारे अंकुर

अपने में समेटे बढ़ चलेगी

एक नये सृजन संसार की

तलाश में ,

नित नवीन सृष्टि के लिये !


साधना वैद

Friday, July 22, 2011

मुझे अच्छा लगता है


दिल की दीवारों पर लिखी

वर्षों पुरानी धुँधली सी इबारतों को

यत्न कर साफ़-साफ़ पढ़ना

मुझे अच्छा लगता है ,

खिले गुलाब की हर पंखुड़ी पर

सम्पूर्ण समर्पण और भावना के साथ

तुम्हारा ‘आई लव यू’ उकेरना

मुझे अच्छा लगता है !

खिडकी की सलाखों पर सिर टिका

इंतज़ार में आँखे बिछाये अधीरता से

घंटों तुम्हारा सड़क को निहारना

मुझे अच्छा लगता है !

बहुत पीछे छूट गये

अपने हमसायों के कदमों की

बेहद धीमी आहट को

कान लगा कर सुनने की कोशिश करना

मुझे अच्छा लगता है !

मन की अतल गहराइयों में कहीं

दबे छिपे विस्मृत प्रणय गीतों की

मधुर पंक्तियों को सायास दोहराना

मुझे अच्छा लगता है ,

कस कर बंद किये गये तुम्हारे

अधरों का कुछ कहने के लिये

तत्पर हो धीमे-धीमे खुलना

मुझे अच्छा लगता है !

ढीली गुँथी चोटी को सामने कर

काँपती उँगलियों से तुम्हारा

बार-बार उसे खोलना और गूँथना

मुझे अच्छा लगता है ,

किसी सवाल के जवाब में

तुम्हारा अपने दुपट्टे के छोर को

दाँतों से दबाना और

सलज्ज पलकों को ऊपर उठा

अपनी मौन दृष्टि को मेरे चहरे पर

गहराई तक रोप देना

मुझे अच्छा लगता है !

इन मीठी यादों को सहेजना ,

समेटना और फिर से जी पाना

मुझे अच्छा लगता है ,

बस बदलते समय के साथ

बदलते परिवेश में

प्रणय निवेदन के बदलते प्रतिमानों

और बदलती परिभाषा के साथ

समझौता करना

मुझे अच्छा नहीं लगता !

साधना वैद

Monday, July 18, 2011

कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ


आज सावन का पहला सोमवार है ! सभी पाठकों को श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनायें !

कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !

असुरों ने धरती को है आक्रान्त किया ,

सीधे सादे जन मन को है त्रस्त किया ,

कहाँ छिपा कर रखा है डमरू अपना ,

कब आओगे तज कर सिंहासन अपना !

लगी है तुमसे सारी आस ,

कहाँ हो तुम अब भोले नाथ !

शशि शेखर को तुमने माथे पर धारा ,

पावन गंगा को निज केशों में धारा ,

सर्प विषैले हिय पर शोभा पाते हैं ,

भूत पिशाच चरण रज पाने आते हैं !

कहाँ है गण चर सारे आज !

कहाँ हो तुम अब भोले नाथ !

धरती पर आई कैसी विपदा भारी ,

दुष्टों की करनी से मानवता हारी ,

लेकर अपनी फ़ौज ज़रा नीचे आओ ,

खोलो तीजा नेत्र, खलों को धमकाओ !

उठाओ अपना भाला आज ,

कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !

धरती को असुरों से खाली करना है ,

भक्तों के दुःख औ पीड़ा को हरना है ,

ताण्डव अपना इस धरती पर कर जाओ ,

काम, क्रोध, मद, लोभ भस्म सब कर जाओ !

तुम्हारी यहाँ ज़रूरत आज ,

कहाँ हो तुम अब भोलेनाथ !

साधना वैद

Wednesday, July 13, 2011

सम्भल के रहना अपने घर में ----

मुम्बई में हुए बम धमाकों ने आज फिर देश को दहला दिया है ! व्यस्तता अधिक होने की वजह से कुछ नया नहीं दे पा रही हूँ इन दिनों लेकिन आज अपना एक पुराना आलेख मैं पुन: पोस्ट कर रही हूँ क्योंकि यह आज की इस विचलित कर देने वाली दुर्घटना के सन्दर्भ में भी कदाचित उतना ही प्रासंगिक है !

सम्भल के रहना अपने घर में ----

अपने बचपन की यादों के साथ देश प्रेम और देश भक्ति के जो चन्द गाने आज भी ज़ेहेन में गूँजते हैं उनके सम्मोहन से इतने वर्षों बाद आज भी मुक्त हो पाना असम्भव सा लगता है । संगीत के सूक्ष्म गुण दोषों के पारखी महान संगीतकारों के लिये हो सकता है ये गीत अति सामान्य और साधारण गीतों की श्रेणी में शुमार किये जायें लेकिन बालमन पर इनका प्रभाव कितना स्थायी और अमिट होता था यह मुझसे बढ़ कर और कौन जान सकता है । “ दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल “, “ आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की “ ,“ सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा “ , जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती हैं बसेरा “ ऐसे ही और भी ना जाने कितने गीत थे जिनको सुनते ही मन गर्व से भर उठता था और आँखे भावावेश से नम हो जाया करती थीं । उन्ही दिनों एक गीत और बहुत लोकप्रिय हुआ था जो वर्तमान समय में जितना सामयिक और प्रासंगिक है उतना शायद उन दिनों में भी नहीं होगा । वह गीत है _ “ कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से सम्भल के रहना अपने घर में छिपे हुए ग़द्दारों से “ । इस गाने की सीख को हम क्यों भुला बैठे ? यदि हमने इस बात पर ग़ौर किया होता तो आज हमारे देश को ये छिपे हुए ग़द्दार इस तरह से खोखला नहीं कर पाते ।
समाचार पत्र और टी वी के सभी न्यूज़ चैनल आतंकवादियों के नये-नये कारनामों और भारत के समाज और सरज़मीं पर उनकी गहरी जड़ों के वर्णन से रंगे रहते हैं । लेकिन क्या कभी कोई इस पर विचार करता है कि कैसे ये आतंकवादी ठीक हमारी नाक के नीचे इतने खतरनाक कारनामों को अंजाम दे लेते हैं और हम बेबस लाचार से इनके ज़ुल्म का शिकार हो जाते हैं और प्रतिकार में कुछ भी नहीं कर पाते । इसकी सिर्फ एक वजह है कि यहाँ चप्पे-चप्पे पर उनके मददगार बैठे हुए हैं जो उनकी हर तरह से हौसला अफ़ज़ाई कर रहे हैं , उनकी ज़रूरतें पूरी कर रहे हैं और अपने देश और देशवासियों के साथ ग़द्दारी कर रहे हैं । कोई उनको नकली पासपोर्ट बनाने में मदद कर रहा है, तो कोई उनको सैन्य गतिविधियों और संवेदनशील ठिकानों की जानकारी उपलब्ध करा रहा है, तो कोई उन्हें अपने घर में शरण देकर उनका आतिथ्य सत्कार कर रहा है और उन्हें अपने नापाक इरादों को पूरा करने देने के लिये अवसर प्रदान कर रहा है तो कोई उन्हें उनकी आवश्यक्ता के अनुसार हथियार और विस्फोटकों की आपूर्ति कर रहा है । जैसे कि वे कोई आतंकवादी नहीं हमारे कोई अति विशिष्ट सम्मानित अतिथि हैं । और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे “ मेहमान नवाज़ “ समाज के निचले वर्ग में ही नहीं मिलते ये तो समाज के हर वर्ग में व्याप्त हैं । नेता हों या अभिनेता , सैनिक अधिकारी हों या प्रशासनिक अधिकारी , प्राध्यापक हों या विद्यार्थी , धर्मगुरू हों या वैज्ञानिक , कम्प्यूटर विशेषज्ञ हों या वकील , सेना या पुलिस के जवान हों या ढाबों और चाय की दुकानों पर काम करने वाले ग़रीब तबके के नादान कर्मचारी जिनमें दुर्भाग्य से अबोध बच्चे भी शामिल हैं , सब अपने छोटे-छोटे व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिये अवसर पाते ही देश के साथ ग़द्दारी करने से पीछे नहीं हटते । फिर चाहे कितने ही निर्दोष लोगों की जान चली जाये या देश की फ़िज़ा में कितना ही ज़हर क्यों ना घुल जाये । इनके अंदर का भारतवासी मर चुका है । ये सिर्फ लालच का एक पुतला भर हैं जिन्हें ना तो देश से प्यार है ना देशवासियों से । किसी को पैसों का लालच है तो किसीको धर्म के नाम पर गुमराह किया जाता है । अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को दबा ये अपने विदेशी आकाओं की बीन पर नाचने के लिये मजबूर हो जाते हैं ।
विदेशों से आये आतंकवादियों की खोजबीन में जितनी कसरत कवायद की जाती है उसकी आधी भी यदि घर के भेदी इन “ विभीषणों “ को पहचानने में और उन पर कड़ी कार्यवाही करने में लगाई जाये तो आधी से ज़्यादह समस्या खुद ही समाप्त हो जायेगी और आतंकवादियों की जड़ें ढीली हो जायेंगी क्योंकि इनकी मदद के बिना बाहर से आये विदेशी आतंकवादी आसानी से घुसपैठ कर ही नहीं सकते । जब तक स्थानीय लोगों का साथ और सहयोग इन दुर्दांत आतंकवादियों को मिलता रहेगा इनके हौसले बुलन्द रहेंगे और मुम्बई, दिल्ली, गुजरात और हैदराबाद जैसी भीषण काण्ड घटित होते रहेंगे । अनेकों निर्दोष लोगों की बलि चढ़ती रहेगी और अनगिनत घर परिवार उजड़ते रहेंगे ।
सवाल यह उठता है कि देश का कामकाज चलाने के लिये और लोगों की सुरक्षा के लिये जिन ज़िम्मेदार व्यक्तियों को यह काम सौंपा है यदि वे ही अपने कर्तव्यपालन से चूक जाते हैं या बेईमानी पर उतर आते हैं तो आम आदमी किसके पास जाये अपनी फरियाद लेकर ? ऐसी स्थिति में हमें स्वयम ही खुद को सबल , समर्थ और सक्षम करना होगा । मेरा सभी भारतवासियों से निवेदन है कि सजग रहिये, सतर्क रहिये, चौकन्ने रहिये अपनी आँखे और कान खुले रखिये, यदि कोई भी संदेहास्पद गतिविधि या व्यक्ति आपकी नज़र में आते हैं तो उसे अनदेखा मत करिये और अपने देश को ऐसे ग़द्दारों के हाथों खोखला होने से बचाइये । देश को तोड़ने वालों की कमी नहीं है । आज ज़रूरत है देश को जोड़ने वालों की । उसे एकता के सूत्र में पिरोने वालों की । आज अपने देश की पहरेदारी के लिये हमें खुद कमर कस कर तैयार रहना होगा और इन छिपे हुए ग़द्दारों से अपने देश को बचाना होगा । अपने कर्तव्य को पहचानिये और मातृभूमि के प्रति अपने ऋण को चुकाने से पीछे मत हटिये । अशेष शुभकामनाओं के साथ आप सभी को मेरा जय भारत ! जय हिन्दोस्तान !

साधना वैद