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Monday, August 6, 2012

आदत

आँखों के दरीचों में
वक्त की सुनामी और
गहन तीव्रता से आये भूकंप
के बाद भी एक
नन्हा सा, नाज़ुक सा ख्वाब
पलकों की ओट में
कहीं अटका रह गया है !
डरती हूँ
तुम्हारी उपेक्षा की आँच
कहीं इसे झुलसा कर
नष्ट ना कर दे 
और मेरी आँखों के ये दरीचे
कहीं फिर से
सूने ना हो जाएँ !
आजकल सन्नाटों की आशंका
मुझे बहुत डरा जाती है
क्योंकि मुझे
संशय और दुविधाओं के साथ  
जीने की आदत
जो पड़ गयी है ! 
साधना वैद