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Monday, August 13, 2012

तुम जो चलते साथ



 











राहे मंजिल कंटकों से थी भरी
हर कदम, हर मोड़ पर बाधा खडी
टूटता था हौसला हर पल मेरा
तुम पकड़ कर हाथ चलते साथ
कुछ मुश्किल न था ! 

नाव थी चहुँ ओर तूफ़ाँ से घिरी
कौंध कर हर साध पर बिजली गिरी
हहर कर उमड़ी डुबोने को लहर  
थाम लेते तुम अगर पतवार
कुछ मुश्किल न था ! 
  .
किस कदर हमको तुम्हारी आस थी
अनगिनत वादों की दौलत पास थी
फासलों को पाटने के वास्ते
बस बढ़ा देते कदम तुम एक
कुछ मुश्किल न था ! 

कब तलक डूबे रहें इस सोग में
ध्यान में पायें तुम्हें या योग में
गुत्थियों को खोलने के वास्ते
ढूँढ देते एक सिरा जो तुम  
कुछ मुश्किल न था !


साधना वैद