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Monday, August 27, 2012

वितान



मैं इन दिनों
प्राण प्राण से
अपने मन की
बूँद-बूँद 
रिसती हुई
सारी कोमलता,
सारी भावुकता,
सारी आर्द्रता को
अनुभवों की
आँच पर
खौल कर
वाष्प बन कर
उड़ जाने से
बचाने में लगी हूँ !

अंतर्मन के हर
गवाक्ष पर
कुछ तटस्थता
कुछ असम्पृक्तता
कुछ निर्मोह के
ताने बाने से
एक सुदृढ़ वितान
बुन कर
  मजबूती से उसे  
 तानने में लगी हूँ !

चाहती हूँ
जीवन की कड़ी
धूप से
शुष्क होकर
पल पल बिखरती,
सरकती
क्षय होती
मन की भावनाओं
की बालू में
कहीं तो
शीतलता और
नमी का 
 चाहे हल्का सा ही सही
 कोई तो अहसास
 बचा रह जाये 
  ताकि जब तुम
  उसे स्पर्श करो
  तो तुम्हारी उँगलियाँ
  झुलस ना जायें !
 



साधना  वैद