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Sunday, June 30, 2013

ओ कालीदास के मेघदूत .....



ओ कालीदास के मेघदूत

कहाँ हो तुम ?

क्या तुमने भी कलयुग में आकर

अपनी प्रथाएँ और

परम्परायें बदल ली हैं ?

क्योंकि

नहीं करते ये मेघ अब

विश्वसनीय दूत का काम,

नहीं लाकर देते ये सन्देश

विरहाकुल प्रियतमा को

उसके प्रियतम का,

नहीं देते ये कोई सांत्वना  

भग्नहृदया विरहिणी को,
 अब कलयुग में इनका
ममतामय हृदय तनिक भी

विचलित हो द्रवित नहीं होता,

इसके विपरीत यह  

वज्र सा कठोर हो गया है !

ये रिमझिम बरसते नहीं

क्रोध से फट जाते हैं !

ये धीरे-धीरे बहते नहीं

ये दुर्दम्य वेग से अधीर हो

पर्वत शिखरों से समस्त चट्टानों को

अपने साथ बहा ले आते हैं

और साथ में ले आते हैं

प्रलयंकारी विप्लव, बाढ़,

आपदा और हाहाकार ! 


ओ कालीदास के मेघदूत

अलकापुरी की विरहिणी को

आज भी अपने अंतर के व्रणों पर

लेप लगाने के लिये और

उनकी जलन को शांत करने के लिये

तुम्हारे शीतल जल की

दैवीय औषधि की आवश्यकता है

जिससे वह अपने

विरह व्याकुल हृदय का

उपचार कर सके ! 

ओ कालीदास के मेघदूत

तुमसे अनुरोध है  

कलयुग की इस

तामसिक अंधी दौड़ की

प्रवंचना में उलझ कर

कम से कम तुम तो

अपनी सात्विक परम्पराओं

और प्रवृत्तियों को मत छोड़ो !

कम से कम तुम तो सकरुण हो

अपने स्निग्ध आवरण में

विरह विदग्ध हृदयों को

आत्मीयता से बाँध लो
जिससे उनके व्याकुल मन को
कोई सांत्वना, कोई भरोसा,

कोई तो आश्वासन

मिल सके ! 

साधना वैद