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Saturday, June 8, 2013

किसे सहेजूँ ........?


कहो जीवन के सफर की
इस लंबी रात में
चहुँ ओर फैले  
घनघोर अँधेरे को
सहेज कर रखूँ या फिर  
बियाबान जंगल में  
कभी-कभार जुगनुओं से
टिमटिमाते दिख जाते
रोशनी के दो चार कतरों को
सहेज कर रखूँ …?
 
कहो जीवन की बगिया में
उग आये लहू लुहान
कर देने वाले तरह-तरह के
इन कैक्टसों और
कटीली झाड़ियों के काँटों को
सहेज कर रखूँ या फिर
इन कैक्टसों पर कहीं-कहीं
यदा कदा खिल उठे
थोड़ी सी खुशबू बिखेरते
इन दो चार फूलों को
सहेज कर रखूँ …? 

कहो जीवन की इस
लंबी संघर्ष यात्रा में
हर मोर्चे पर मिली
हारी हुई जीत की
कड़वी स्मृतियों को
सहेज कर रखूँ या फिर
जीती हुई बाजी के
गिने चुने पलों की
मधुर स्मृतियों को
सहेज कर रखूँ …?
 
हर गुज़रते पल के साथ
सामान की गठरी और
भारी होती जाती है !
सोचती हूँ यात्रा में
सामान का हल्का
होना ही बेहतर होता है
 इसलिये रोशनी के,
सौरभ के,
  जीत की स्मृतियों के 
 चंद पलों के सामान की
 बहुत छोटी सी
   हल्की सी पोटली ही  
  साथ लिये जा रही हूँ !
बाकी सारा भारी सामान
यहीं छोड़े जाती हूँ !
  मेरे शेष जीवन को  
जीने के लिये
इतना संबल ही
यथेष्ट होगा !
   है ना ...?  


 साधना वैद