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Sunday, September 29, 2013

खंडित साँसें




खुशियों का संसार सुहाना टूट गया,
जनम-जनम का बंधन पल में छूट गया,
जिसके नयनों में मीठे सपने रोपे थे
पलक मूँद वह जीवन साथी रूठ गया !

मन के देवालय की हर प्रतिमा खण्डित है ,
जीवन के उपवन की हर कलिका दण्डित  है,
जिसकी हर मंजिल में जीवन की साँसें थीं 
चूर-चूर हो शीशमहल वो टूट गया !




साधना वैद

Saturday, September 21, 2013

चेहरा



चित्र  गूगल से साभार

Tuesday, September 17, 2013

उसके हिस्से का आसमान

असमंजस की भूलभुलैया में
उसकी आँखों पर
दुराग्रहों की काली पट्टी बाँध
चुनौतियों की दोधारी
पैनी तलवार पर तुम उसे
सदा से चलाते आ रहे हो !
उसके हिस्से के सुख,
उसके हिस्से के फैसले,
उसकी आँखों के सपने,
उसके हिस्से की महत्वाकांक्षायें,
सब दुबका के रख लिये हैं
तुमने अपनी कसी हुई
बंद मुट्ठी के अंदर
जिन्हें तुम अपनी मर्जी से
खोलते बंद करते रहते हो !  
लेकिन क्या तुम जानते हो
तुम्हारी इन गतिविधियों के
तूफानी थपेड़े
उसके अंतर की ज्वाला को
धौंकनी की तरह हवा देकर
किस तरह और तेज़
प्रज्वलित कर जाते हैं !
किसी दिन यह आग
जब विकराल दावानल का
रूप ले लेगी तो तुम्हारे
दंभ और अहम का
यह मिथ्या संसार
क्षण भर में जल कर
राख हो जायेगा !
उसे अपना जीवन खुद जीने दो
उसे अपने फैसले खुद लेने दो
उसे अपने सपने खुद
साकार करने दो !
फिर देखना कैसी
शीतल, मंद, सुखद समीर
तुम्हारे जीवन को सुरभित कर
आनंद से भर जायेगी !
उसे अपनी पहचान सिद्ध करने दो
उसे अपने चुने हुए रास्ते पर
अपने आप चलने दो
उसके कमरे की सारी
बंद खिड़कियाँ खोल कर
उसे तुम ताज़ी हवा में
जी भर कर साँस लेने दो  !
उसे बंधनों से मुक्ति चाहिये  
उसकी श्रृंखलाओं को खोल कर
तुम उसे उसके हिस्से का
आसमान दे दो !
उस पर विश्वास तो करो
जहाज के पंछी की तरह
वह स्वयं लौट कर अपने
उसी आशियाने में
ज़रूर वापिस आ जायेगी ! 




साधना वैद !

Wednesday, September 11, 2013

हर लम्हा हर पल ......


हालात की पेचीदगियों ने
वक्त की पेशानी पर
हर रोज़ जो नयी सिलवटें डालीं हैं
उन ज़िद्दी सिलवटों को  
मिटाते-मिटाते
पूरी एक उम्र मैंने
यूँ ही नहीं गुज़ार दी है
हर लम्हा हर पल
खुद को भी मिटाया है ! 

ज़िंदगी की स्लेट पर
तुमने जो मुश्किल सवाल
मेरे हल करने को
लिख दिये थे
उन्हें हल करते-करते
पूरी एक उम्र मैंने
यूँ ही नहीं गुज़ार दी है
हर लम्हा हर पल
खुद भी एक अनसुलझी पहेली
बन कर रह गयी हूँ ! 

यह जानते हुए भी कि
मुझे तैरना नहीं आता
जिस आग के दरिया में
मुझे धकेल कर सब
घर को लौट गये थे
उस आग के सैलाब में
जलते झुलसते
डूबते उतराते
तैरना सीखने में
पूरी एक उम्र मैंने
यूँ ही नहीं गुज़ार दी है
हर लम्हा हर पल
उस आँच में तप कर
कुंदन की तरह
निखरना भी मैंने
सीख लिया है !

साधना वैद


चित्र गूगल से साभार

Sunday, September 8, 2013

आने वाले कल की ये तस्वीर हैं




नेहरू जी बच्चों को बहुत प्यार करते थे ! इतना अधिक कि उनका जन्मदिन भी बाल दिवस के रूप में मनाया जाता था ! जन्मदिन मनाने की परम्परा आज भी उतनी ही पाबंदी से कायम है ! लेकिन उनकी विरासत सम्हालने वालों ने कितनी पाबंदी के साथ देश के बच्चों का ध्यान रखा है और उनके साथ न्याय किया है उसकी कुछ तस्वीरें आपको दिखाना चाहती हूँ ! नेहरू जी का स्वर्गवास हुए लगभग पचास साल होने को आये हैं लेकिन हमारे नेताओं के तमाम दावों के बाद भी देश की एक बहुत बड़ी आबादी के बच्चों की तकदीर में कोई बदलाव नहीं आया है !
ये बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं ! हमारे आने वाले कल की ये तस्वीर हैं ! अद्यतन सर्वे के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या का २२% हिस्सा भुखमरी के कगार पर है जिन्हें हम अपनी सुविधा के अनुसार गरीबी की रेखा से नीचे ( बी. पी. एल. ) के नाम से संबोधित करते हैं क्योंकि हमारी अंतरात्मा को शायद ‘भुखमरी’ शब्द के उच्चारण से शर्म आती है ! जनसंख्या का २५% वह हिस्सा है जो संपन्न है और जो उन सभी सुविधाओं का उपभोग कर पाता है जो दिश्व के अन्य विकसित देशों के लोगों के पास उपलब्ध हैं ! इसके अलावा भारत की जनता का बचा हुआ ५३% हिस्सा है तो गरीब ही ! चाहे हम उसे हम अपनी समझ के अनुसार कितनी ही श्रेणियों में बाँट लें !
असल में गरीबी और अमीरी तुलनात्मक ही होती है ! उदाहरण के लिये ऑफिस का चपरासी हमारी काम वाली बाई से अमीर है लेकिन अपने अधिकारी से गरीब है ! हमारी काम वाली बाई शायद पटरी पर सोने वाले परिवारों से अमीर है और जिसके पास सोने के लिये पटरी भी नहीं है उससे नीचे की भी कई श्रेणियाँ हैं !
नीचे दिए गये चित्र भारत की गरीबी के विभिन्न आयामों को दिखाते हैं जो वैसे तो मन को दुखी कर जाते हैं परन्तु हमको झकझोर कर जगाने में भी पर्याप्त रूप से सक्षम हैं ! आम चुनाव दूर नहीं हैं ! हमें क्या करना है यह अभी ही सोचना होगा ! 

साधना  वैद














सभी चित्र गूगल के सौजन्य से साभार ....