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Wednesday, October 29, 2014

संध्या और चाँद


संध्या के चेहरे पर पड़ा
खूबसूरत सिंदूरी चूनर का
यह झीना सा अवगुंठन
आमंत्रित कर रहा है
प्रियतम चन्द्रमा को कि
वह अपनी स्निग्ध किरणों की
सुकोमल उँगलियों से 
सांध्य सुन्दरी के मुख पर पड़े
घूँघट के इस अवरोध को
हटा दे ,
और अपनी सम्पूर्ण ज्योत्सना
भव्यता और दिव्यता के साथ
विशाल गगन महल के
सुन्दर झरोखे पर आकर
अपनी प्रियतमा को दर्शन दे
प्रतीक्षा के इन विकल पलों की
अवधि को घटा दे ! 

संध्या की सतरंगी चूनर में
टाँकने के लिये लाखों सितारे
चन्द्रमा ने अपने हाथों से
गगन में बिखेर दिये हैं ,
और अनुरक्त प्रियतमा ने
वो सारे सितारे पुलक-पुलक कर
अपनी पलकों से दामन में
समेट लिये हैं ! 

चन्द्रमा की प्रतिदिन घटती बढ़ती
कलाओं के अनुरूप  
संध्या के हृदय में भी
हर्ष और विषाद की मात्रा
नित्य घटती बढ़ती है ,
पूर्णिमा के दिन सर से पाँव तक
सोलह श्रृंगार कर दुल्हन सी
सजी अति उल्लसित संध्या
अमावस्या की रात में
विरहाकुल हो अपने
प्रियतम की प्रतीक्षा में
व्याकुल मलिन मुख  
सारी रात रोती है ! 

संध्या और चन्द्रमा का
आकर्षण और विकर्षण 
अनुराग और वीतराग का 
यह खेल सदियों से 
इसी तरह
चल रहा है ,
सुख के समय में
संयत रहने का और
दुःख के समय में धैर्य
धारण करने का सन्देश
हमें दे रहा है !

साधना वैद