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Tuesday, October 7, 2014

एक रिश्ता पुराना सा



यूँ ही इस दर्द से रिश्ता मेरा पुराना है
छू के हर नक्श एक दूसरे को जाना है ! 

बड़े दिनों से इससे दोस्ती है, निस्बत है
बड़े दिनों से इसका घर में आना जाना है !

न कभी भूले से भी साथ इसने छोड़ा है
गवाही देने को तैयार ये ज़माना है ! 

ज़माने भर में भले छाई हो बहार-ए-चमन
हमारे दिल में तो सहरा सा ये वीराना है !

यूँ ही रो लेने की हमको तो महज़ आदत है
तेरे ना आने का तो बस फकत बहाना है !

हैं दिल में ज़ख्म कई नश्तरों के चुभने से
वो किसके हाथ थे इस दर्द ने पहचाना है !

बस यही एक है हमदर्द इस ज़माने में
सिवाय इसके यहाँ हर कोई बेगाना है ! 

भुला दिये जो कभी हमने दोस्ती के उसूल
सिखाये इसने ही कैसे इन्हें निभाना है ! 

कहाँ मिलेगा ऐसा दोस्त सारी दुनिया में
लिये चिराग फिरा करता ये दीवाना है !

बने हैं दोनों ही हम एक दूसरे के लिये
ना हमें ठौर ना उसको कहीं ठिकाना है !

साधना वैद