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Tuesday, December 30, 2014

अतिथि देवो भव


हमारी भारतीय संस्कृति की यह परम्परा रही है कि हम अपने अतिथियों को देवतुल्य मानते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनके स्वागत सत्कार और अभ्यर्थना में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । अतिथियों के साथ सज्जनता से व्यवहार करना, उनकी आवश्यक्ताओं को समझ कर उनको पूरा करने के लिये प्रयत्नशील रहना, उनके मान सम्मान और उनकी सुख सुविधा का ध्यान रखना और उनके लिये यथा सम्भव एक सुखद और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण उपलब्ध कराना ही अब तक हमारी सर्वोपरि प्राथमिकता रही है और आज भी होनी चाहिये । यही संस्कार बचपन से हमें हमारे माता पिता देते आये हैं और स्कूलों में भी यही शिक्षा अब तक हमें अपने गुरुजनों से मिली है ।
वर्तमान संदर्भ में ये अवधारणायें अपना औचित्य खोती हुई प्रतीत होती हैं । कहीं न कहीं मूल्यों का विघटन इतनी बुरी तरह से हुआ है कि विश्व बिरादरी के सामने हमें अक्सर शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता है । सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भारत एक अत्यंत वैभवशाली और समृद्ध देश है । यहाँ के छोटे से छोटे गाँव या कस्बे से भी अतीत के गौरव की अनमोल गाथायें गुँथी हुई हैं । यहाँ के कण-कण में पर्यटकों को लुभाने और मोहित कर लेने की अद्भुत क्षमता है । हम अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत एक विकासशील देश है और यहाँ की अर्थ व्यवस्था में पर्यटन व्यवसाय का बहुत अधिक महत्व है । यदि हम अपने देश में आने वाले पर्यटकों का विशिष्ट ध्यान रखें उन्हें भारत भ्रमण के समय सम्पूर्ण निष्ठा और सद्भावनापूर्ण सहयोग के साथ उनकी सहायता करें तो इस व्यवसाय की आय में चार चाँद लग सकते हैं । लेकिन होता बिल्कुल इसके विपरीत है । मैं विश्व प्रसिद्ध ताजनगरी आगरा में रहती हूँ और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों को आत्मावलोकन के लिये यह बताना चाहती हूँ कि हम अपने अतिथियों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं इस पर चिंतन करने की महती आवश्यक्ता है । ज़रा ध्यान दें – पर्यटक रेल से या बस से नगर में जैसे ही प्रवेश करते हैं लपके जोंक की तरह उनसे चिपट जाते हैं और कभी कभी तो पर्यटक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की होड़ में खींचतान करने से भी पीछे नहीं हटते । यदि आगंतुक पर्यटक का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित है तो अपने असंतोष को व्यक्त करने के लिये वे अशोभनीय और आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने से खुद को रोक नहीं पाते । पर्यटक भले ही कहे हुए वाक्य का शाब्दिक अर्थ ना समझ पायें लेकिन लपकों की भाव भंगिमा और आवाज़ के उतार चढ़ाव से उन्हें समझने में ज़रा भी देर नहीं लगती कि उनके लिये कैसी अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जा रहा है और नगर में प्रवेश के साथ ही उनका मन खट्टा हो जाता है । पर्यटकों के मार्गदर्शन के लिये जो पुस्तिकायें छपती हैं उनमें भी इन लपकों से सावधान रहने की हिदायतें दी गयी हैं । क्या हमें इस पर विचार नहीं करना चाहिये कि ये लपके किसकी शह पर क्रियाशील रहते हैं और इनके व्यवहार पर नियंत्रण लगाने के लिये क्या प्रयास किये जा रहे हैं ? ज़बर्दस्ती कर अपने वाहन से ले जाने की ज़िद करना, फिर अपनी पसन्द के होटल में ठहरने के लिये विवश करना, अपने कमीशन बँधे हस्त शिल्प के शो रूम्स से खरीदारी करने के लिये मजबूर करना, जैसे कृत्य तो हम भारवासियों के लिये अति सामान्य और सर्व साधारण द्वारा मान्यता प्राप्त हो गये हैं लेकिन बाहर से आने वाले अतिथि अवश्य इस प्रकार के अभद्र आचरण से असंतुष्ट और रुष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार की अप्रत्याशित मेहमाननवाज़ी से वे सकते में आ जाते हैं । सड़कों पर गली मोहल्लों के अशिक्षित बच्चे उन्हें अश्रवणीय और अकथनीय भाषा में तरह तरह के नामों से पुकार कर उनका मज़ाक बनाते हैं, स्मारकों पर जहाँ जूते उतारना अनिवार्य हो जाता है अक्सर उनके कीमती जूते चोरी हो जाते हैं, पर्यटकों के हाथों से उनके बैग और कैमरे छीन लिये जाते हैं, महिलाओं के साथ छेड़खानी की जाती है यहाँ तक कि कई बार उनके साथ यौन शोषण और बलात्कार की घटनायें भी संज्ञान में आई हैं । हमारे शहर में आकर वे अपना रुपया पैसा और सभी कीमती सामान गँवा कर बड़ी परेशानी में फँस जाते हैं । इस पर क्या पर्यटकों की संख्या में आने वाली कमी की शिकायत करने का हमारा कोई नैतिक आधार बनता है ? क्या इस तरह के आचरण पर अंकुश लगाने की हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती ? अगर हम ग़लत आचरण को रोक नहीं सकते तो उसकी वजह से होने वाले नुक्सान की भरपाई के लिये भी हमें तैयार रहना चाहिये । आखिर इस घर के मेजबान भी तो हमीं हैं । जैसा आतिथ्य सत्कार हम अपने अतिथियों को देंगे वैसा ही प्रतिदान हम उनसे पायेंगे ।
इन सबके अलावा कभी हम अपने शहर की स्वच्छता और साज सज्जा की तरफ भी ध्यान देते हैं ? जगह-जगह पर गन्दगी और कूड़े के ढेर सड़कों पर सजे रहते हैं । मच्छर और मक्खियों का बोलबाला है । शहर की एकाध विशिष्ट सड़क को छोड़ दिया जाये तो अधिकांश सड़कें टूटी-फ़ूटी और छोटे-बड़े गड्ढों से आच्छादित हैं । पर्यटक मलेरिया और हैजे के डर से शहर में घुसने से भी डरते हैं । गन्दगी के ढेर उनके सौंदर्य बोध को ग्रहण लगाते हैं और वे जान छुड़ा कर यहाँ से भागना चाहते हैं । क्या हम इस सबको रोकने के लिये कोई प्रयत्न कर रहे हैं ?
हमारा प्रशासन और पुलिस कितनी कार्यकुशल और तत्पर है यह तो सभी जानते हैं । इन समस्याओं से जूझने के लिये हमें स्वयं अपनी कमर कसनी होगी । पर्यटन व्यवसाय से जुड़े सभी उद्यमियों और संगठनों को एक समानांतर फौज खड़ी करनी होगी जो इस तरह के कुकृत्यों पर अंकुश लगा सके और इस प्रकार की असामाजिक गतिविधियों में लिप्त लोगों को दण्डित कर एक भयमुक्त वातावरण की रचना कर सके । शहर की साफ सफाई के लिये नगरपालिका पर निर्भर रहने की बजाय सफाई कर्मियों को संगठन स्वयम नियुक्त करे और उन्हें अच्छा वेतन देकर उनसे अच्छा काम ले । सभी ऐतिहासिक इमारतों और पर्यटकों की रुचि के स्थलों के आस-पास नियमित रूप से डी डी टी और मक्खी मच्छरों को मारने के लिये उपयुक्त दवाओं का छिड़काव किया जाये । ताकि पर्यटकों को बीमार होने का अंदेशा ना रहे ।
यदि वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को साकार करना है तो इस विचार को भी आत्मसात करना होगा कि विश्व के हर देश के लोग हमारे सगे सम्बन्धी हैं और हमें उन्हें वही आदर मान देना होगा जो हम अपने सगे सम्बन्धियों को देना चाहते हैं । तभी हमारे देश का गौरव बढ़ेगा, पर्यटकों की संख्या में भी आशातीत वृद्धि होगी, कमर टूटते पर्यटन व्यवसाय को भी सहारा मिलेगा और साथ ही देश की अर्थ व्यवस्था में भी कुछ सुधार आयेगा ।

साधना वैद

Wednesday, December 24, 2014

कसक















कैसा लगता है
जब गहन भावना से परिपूर्ण
सुदृढ़ नींव वाले प्रेम के अंतर महल को
सागर का एक छोटा सा ज्वार का रेला
पल भर में बहा ले जाता है ।
क़ैसा लगता है
जब अनन्य श्रद्धा और भक्ति से
किसी मूरत के चरणों में झुका शीश
विनयपूर्ण वन्दना के बाद जब ऊपर उठता है
तो सामने न वे चरण होते हैं और ना ही वह मूरत ।
क़ैसा लगता है
जब शीतल छाया के लिये रोपा हुआ पौधा
खजूर की तरह ऊँचा निकल जाता है
जिससे छाया तो नहीं ही मिलती उसका खुरदरा स्पर्श
तन मन को छील कर घायल और कर जाता है ।
कैसा लगता है
जब पत्तों पर संचित ओस की बूंदों की
अनमोल निधि हवा के क्षणिक झोंके से
पल भर में नीचे गिर धरा में विलीन हो जाती है
और सारे पत्तों को एकदम से रीता कर जाती है ।

साधना वैद

Friday, December 19, 2014

आतंकी नाच




फिज़ां में खौफ
दस्तक आतंक की
मासूम मौतें !

आतंकी खेल
सहमे से चेहरे
खूनी दरिंदे !

खूनी संगीनें
खौफनाक मंज़र
रोते माँ बाप !

बच्चों की लाशें
बिलखते माँ बाप
खामोश खुदा !

शातिर चालें
सियासी दांव पेंच
जुबानी बातें !

हैरान सारे
दहशत के मारे
शर्मिन्दा खुदा !

आतंकी नाच
ग़मज़दा माहौल
सुन्न सन्नाटा !

विषैली धरा
नफ़रत के बीज
हिंसा की खाद
फसल में उगते
बेरहम दरिंदे !

देख ले खुदा
कैसे बनाए तूने
वहशी बंदे
फर्क ना कर पाए
पाप और पुण्य में !

कहाँ सो गया
मेहरबान मौला
झेल न पाया
यह आतंकी खेल
अपने ही बन्दों का !

बख्शना मत
रहमान अल्लाह  
सख्त सज़ा दे
वहशी दरिंदों को
बच्चों के कातिलों को !

साधना वैद !

Tuesday, December 16, 2014

दिन था रविवार


रेखा जी ने पूछा एक सवाल
आज कौन-कौन निभा पाया
अपनी रजाई से प्यार ?
सुनाना चाहा जो हाले दिल तो
बन गयी यह कविता मज़ेदार !
 दिन था रविवार
एक तो वैसे ही घर में रहती है
किस्म-किस्म के कामों की भरमार
उस पर अगर बच्चों की छुट्टी हो तो
घर में माहौल ऐसा हो जाता है
जैसे चल रहा हो कोई
बड़ा सा उत्सव या त्यौहार !
तरह तरह की फरमाइशें
तरह तरह के इसरार !
एक खत्म हुई नहीं कि
दूसरी का इज़हार !
ऐसे में भला कौन निभा सकता है
रजाई से अपना प्यार !
उस पर आने जाने वालों का 
तांता बेशुमार !
चेहरे पर कभी सच्ची तो कभी झूठी
मुस्कराहट लिये 
हम करते रहे  
सबका स्वागत हर बार !
खड़े रहे किचिन में 
ड्यूटी पर झख मार
बनाते रहे और पीते पिलाते रहे
सबको चाय बार-बार !
और हसरत भरी निगाहों से 
किचिन से ही निहारते रहे
अपनी प्यारी रजाई को मन मार
जो सुबह एक बार तहाने के बाद
शाम होने तक 
खुली ही नहीं थी 
एक भी बार !
तो हमारा तो ऐसा बीता रविवार
और आपका ?  
  
 साधना वैद


Sunday, December 14, 2014

धर्मांतरण पर बवाल




धर्मांतरण पर बवाल
 

धर्म क्या है ? शब्दकोष के अनुसार धर्म का अर्थ है – विश्वास, कर्तव्य और एक या अनेक दैवीय शक्तियों के प्रति आस्था जिन्होंने समूचे संसार को बनाया है और जिनके कारण इस सृष्टि का कारोबार चलता है !

यद्यपि बाद में नास्तिक होना भी एक धर्म मान लिया गया ! अनेक धर्म अस्तित्व में आये, उनमें भी समय के साथ बदलाव हुआ और उनके मानने वालों की संख्या कभी घटी तो कभी बढ़ी ! हिन्दू, ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि सभी धर्मों में परिवर्तन की यह प्रक्रिया चलती रहती है ! एक ही धर्म के मानने वाले अनुयायी भी अपनी-अपनी समझ के अनुसार अनेकों शाखाओं उपशाखाओं में बँटते जाते हैं ! यह एक सतत प्रक्रिया है और क्योंकि मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है, नई सोच के अनुसार आवश्यक बदलाव के प्रति उन्मुख होना उसका स्वभाव है !

समस्या तब आती है जब धर्म और भौतिक शक्तियों के घालमेल की वजह से संशय की स्थिति पैदा हो जाती है और किसी एक धर्म के मानने वाले के शासक बन जाने पर अथवा शक्तिशाली हो जाने पर हम इसे उस धर्म विशेष की जीत के रूप में देखने लगते हैं ! इसी तरह किसी एक धर्म के मानने वालों की संख्या बढ़ जाने से हम इसे उस धर्म की विजय मानने लगते हैं ! उदाहरण के लिये जब जॉर्ज बुश ने सद्दाम हुसैन को परास्त कर दिया तो ईराक में इसे इस्लाम की हार और क्रिश्चियनिटी की जीत के रूप में देखा गया ! इसी तरह जब मौहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया तो मुस्लिम जगत में इसे इस्लाम की जीत और हिन्दू धर्म की पराजय के रूप में देखा गया ! इतिहास में ऐसी अनेकों घटनाएं अनेकों बार हर धर्म के साथ घटित हुई हैं लेकिन क्या वास्तव में इन घटनाओं के कारण इस्लाम, हिन्दू या अन्य अनेकों धर्मों का अस्तित्व समाप्त हो गया ? बिलकुल भी नहीं !

प्रथम रक्तहीन धर्मान्तरण उसे कह सकते हैं जब गौतम बुद्ध ने बनारस के हिन्दू विद्वानों को शास्त्रार्थ में हरा कर उन्हें बौद्ध धर्म अपनाने के लिये प्रेरित किया और वे सारे धर्माधिकारी तथा आम जनता सहर्ष स्वेच्छा से बौद्ध धर्म को अपनाने के लिये तैयार हो गये ! संभवत: यह प्रथम रक्तहीन तथा किसी भी प्रकार के प्रलोभन से रहित धर्मांतरण था ! 

वर्तमान समय में भारत की परिस्थितियों पर ज़रा गौर करें ! भारत एक बहुधर्मी देश है जिसमें लगभग ८० प्रतिशत लोग हिन्दू हैं ! दूसरा प्रमुख धर्म इस्लाम है जिसको मानने वाले लगभग १४ प्रतिशत हैं ! ईसाईयों की जनसंख्या मात्र २.५ प्रतिशत ही है ! अन्य धर्मों के अनुयायी शेष ३.५ प्रतिशत में ही सिमट जाते हैं ! अधिकांश हिंदुओं को यह भय लगा रहता है कि कहीं ऐसा न हो जाए कि आगे चल कर उनका यह संख्या बल कम हो जाए ! वहीं मुसलमान और ईसाई अनुयाइयों की सोच यह है कि किसी प्रकार उनका प्रतिशत कुछ बढ़ सके तो वे अधिक सुरक्षित रहेंगे !

स्वतन्त्रता से पहले ब्रिटिश और मुस्लिम शासकों द्वारा लालच देकर और डरा धमका कर बड़ी संख्या में धर्मांतरण करवाया गया ! वर्तमान में भी, क्योंकि देश में गरीबी और बेरोजगारी बहुत अधिक है और आबादी के इसी वर्ग में धर्म परिवर्तन की घटनाएं अधिक हो रही हैं ऐसे में बहुसंख्यक हिंदुओं का यह सोचना स्वाभाविक है कि इसके पीछे कहीं प्रलोभन की राजनीति तो काम नहीं कर रही है और विदेशों से आने वाले धन का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हो रहा है ! भारत के लचीले कानूनों की वजह से बेशुमार धन चर्च, मदरसों और मस्जिदों के रखरखाव के लिये विदेशों से आता है ! दानकर्ताओं में कई अमीर ईसाई व मुस्लिम देश शामिल हैं !


अनेक बार इस तरह से ज़ोर ज़बरदस्ती के साथ धर्म परिवर्तन कराये जाने पर पूर्ण रूप से रोक लगाने के लिये क़ानून बनाने का प्रस्ताव लाया गया पर मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों की नाराज़गी का ख़याल रख कर कभी भी ऐसा प्रभावी क़ानून बन नहीं पाया ! फिर भी राज्य सरकारों के स्तर पर अनेक राज्यों जैसे अरुणांचल प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा हिमांचल प्रदेश में धर्मांतरण पर रोक लगाने वाले कानून बने भी और लागू भी हैं ! मज़े की बात यह है कि ये क़ानून जब लागू किये गये उस समय इन में से अधिकाँश राज्यों में कॉंग्रेस की सरकार थी ! 


अब ज़रा आगरा में हाल ही में हुए धर्मांतरण के प्रसंग पर विचार किया जाए ! सर्वविदित है कि भाजपा का संघ परिवार बड़ा है जिसमें अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र समूह ऐसे भी हैं जिनमें उत्साह से भरपूर और सोच में कंजूस विचारधाराओं वाले अधीर कार्यकर्ताओं की भरमार है ! आगरा में धर्मांतरण का यह आधा अधूरा प्रयास उसी बेसब्रेपन का परिणाम है ! इस समय हमारे राजनेताओं के दोहरे चेहरों को लोकसभा और राज्यसभा में बहस के समय देखा जा सकता है ! जहाँ भाजपा यह कहती है कि हम ऐसी घटनाओं को गलत मानते है और ऐसा क़ानून बनाना चाहिए जिससे लालच देकर धर्मांतरण करने पर रोक लग सके वहीं कॉंग्रेस और उसके साथी दल ऐसा कोई भी क़ानून बनाने के पक्ष में नहीं हैं और इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं ! वे लोग अपने विरोध को सिर्फ आगरा जैसी घटनाओं को रोकने तक ही सीमित रखना चाहते हैं ! आखिर उनको अपने वोट बैंक की चिंता भी तो करनी है !


खैर ! नेताओं के तमाशे तो चलते ही रहेंगे पर सच बात तो यह है कि ये सब तमाशे गरीबी, बेरोज़गारी और अशिक्षा की वजह से होते हैं ! इन समस्याओं पर जैसे ही नियंत्रण हो जाएगा प्रलोभन देकर कराये जाने वाले इस तरह के धर्मान्तरणों की समस्या अपने आप समाप्त हो जायेगी ! आपने किसी सम्पन्न और शिक्षित व्यक्ति को प्रलोभन या डर की वजह से अपना धर्म बदलते हुए कम ही देखा होगा ! गरीबी उन्मूलन भारत की अनेकानेक समस्याओं की एक मात्र उसी तरह की कारगर दवा है जैसे कि पहले हर कष्ट की एक दवा अमृतधारा हुआ करती थी ! 


साधना वैद   

Wednesday, December 10, 2014

जीवन आधारे - वृक्ष हमारे


कितना देते 
फल, फूल, सुगंध 
वृक्ष हमारे ! 

खुश होते हैं 
हिला कर पल्लव 
वृक्ष साथ में ! 

जिलाते हमें 
देकर प्राण वायु 
वृक्ष उदार !

सुन्दर वन 
रखते हैं स्वच्छ 
पर्यावरण ! 

सिर्फ देते हैं 
कुछ नहीं माँगते 
वृक्ष हमसे ! 

ऊँची डालियाँ 
धूप छाहीं जालियाँ
मोहक रूप ! 

घर का वैद्य
तुलसी का बिरवा
रोगनाशक ! 

केले का पेड़ 
हर रूप में भोज्य 
स्वाद का पुंज ! 

तने से बँधे 
वटसावित्री  पर 
आस्था के धागे ! 

शोभित वृक्ष 
धरा के बदन पर 
आभूषण से ! 

सुदृढ़ वृक्ष 
कमनीय लताएँ 
गाते विहग ! 

शीतल छाँह 
पल्लवों के चँवर
पेड़ों की भेंट ! 

साजिन्दे वृक्ष 
गीत गाती पवन 
मगन धरा ! 

फुदकते हैं 
तरु डालियों पर 
नन्हे परिंदे ! 

झूले की पींगें 
कजरी के अलाप 
नीम का पेड़ ! 

आम  का पेड़ 
खट्टी मीठी कैरियाँ 
यादों का घर ! 

वृक्षों  के जैसा 
दूजा परोपकारी 
कहाँ मिलेगा ! 

वृक्ष जागते 
जगत जब सोता 
बन प्रहरी !

रक्षा वृक्षों की 
कर्तव्य हमारा 
मानना होगा ! 

प्रण लेते हैं 
कटने नहीं देंगे 
एक भी पेड़ !




साधना वैद