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Tuesday, August 25, 2015

बेवजह



कहाँ माँगे थे चाँद और सितारे कभी  

तुम यूँ ही हमसे नज़रें चुराते रहे !


न रही जब ज़ुबानी दुआ और सलाम

बेवजह ख्वाब में आते जाते रहे !


तुम हमारी वफाओं पे हँसते रहे

हम जफा पे तेरी मुस्कुराते रहे !


तेरी यादों ने गाफिल किया इस तरह

बेखुदी में भी तुझको बुलाते रहे ! 


हम तुम्हें याद कर कर के जीते रहे

तुम हमें आदतन बस भुलाते रहे !


जितने नश्तर चुभोये ज़ुबां ने तेरी

हम उन्हें कुल जहाँ से छिपाते रहे ! 


ग़म के सहरा में जलती हुई रूह को  

आँसुओं की नमी से जिलाते रहे !


हम तो मरहम हैं लाये तुम्हारे लिये

तुम अंगारों पे हमको चलाते रहे !
  

वक्त की इन फिज़ाओं में नग़मे तेरे

शाख से टूट कर गुनगुनाते रहे !




साधना वैद