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Thursday, December 31, 2015

हमारा घर


१९४० में बने अपने इस मकान की हीरक जयंति पर विशेष प्रस्तुति !



ईंट गारे चूने से बना यह भवन

केवल एक मकान नहीं है

यह तो युग-युग से साधक रहा है

हर रोज़ परवान चढ़तीं

हमारी बेलगाम ख्वाहिशों का,

हमारे बेहिसाब सपनों का,

हमारे अनगिनत अरमानों का

हमारी हज़ारों हसरतों का

हमारी मधुरतम कोमल कल्पनाओं का !

इस घर की चारदीवारी में मनाये

हर उत्सव, हर त्यौहार में  

हर होली, हर दीवाली में

घुले हैं हमारे जीवन के रंग,

इसके आँगन की

हर सुबह, हर शाम

हर धूप, हर बारिश की

स्मृतियाँ आज भी हैं हमारे संग !

वो होली के अवसर पर आँगन में

बहते उड़ते रंग और गुलाल

वो आँगन की धूप में बैठ

घर की स्त्रियों का सीना पिरोना

और वो बच्चों के धमाल,

वो आँगन भर चटाइयों पर सूखते

बड़ी, मंगौड़ी, पापड़, अचार 

वो तारों पर लटकते

गीले सूखे कपड़ों के अम्बार,

वो गर्मियों में आँगन में

ठंडे पानी का छिड़काव

और खाटों का बिछाना

वो दीवाली पर आँगन के हर हिस्से में

आकर्षक रंगोली का सजाना

वो मिट्ठू का पिंजड़ा और

सिल्की सम्राट के खेल

वो बच्चों की साइकिलें

और खिलौनों की रेल 

वो पापाजी की चाय

और मम्मीजी की तरकारी

वो गरम पानी का चूल्हा और

  इंतज़ार में तकते रहना अपनी बारी !

कितने अनमोल पल हैं

जिनकी यादें अंकित हैं

आज भी इस अंतर में

भूलेंगे नहीं जीवन भर

 जो कुछ पाया है हमने इस घर में !

यह सिर्फ एक घर नहीं है

यह साक्षी है अनगिनत

परिवर्तनों का, प्रत्यावर्तनों का

जिसका हम सबको है आभास,

इसकी हर ईंट पर खुदी हैं

ना जाने कितनी कहानियाँ

और इसकी नींव में दबे हैं  

 ना जाने कितने इतिहास ! 

यहाँ पीढ़ियों ने जन्म लिया है

यहाँ सपनों को पंख मिले हैं

यहाँ ना जाने कितने

नन्हे नन्हे परिंदों ने

अपने सलोने से नीड़ में

आँखें खोली हैं और फिर

अपने सुकुमार पंखों में

असीम ऊर्जा भर नाप डाला है

 समूचे व्योम को अपनी उड़ान से !

यह वह तपोवन है जहाँ तब भी

‘लक्ष्मी’ का निवास था और

आज भी ‘लक्ष्मी’ का निवास है

और आने वाले सालों में भी

 यह ‘लक्ष्मी’ का ही निवास रहेगा  

इसीलिये तो इस घर का नाम

   ‘लक्ष्मी निवास’ है !  
अटूट रिश्तों के

अनमोल धागों से गुँथा यह घर

प्रतीक है हमारी आस्था का

द्योतक है हमारी साधना का

आधार है हमारे विश्वास का !

यह घर हमारे मन में बसा है

और हम इस घर में बसे हैं
हमें गर्व है कि संसार का 
सबसे खूबसूरत यह ‘घर’ 
हमारा आवास है !


 साधना वैद

Monday, December 28, 2015

सर्दी की रात


सर्दी की रात 
ठिठका सा कोहरा 
ठिठुरा गात ! 

तान के सोया 
कोहरे की चादर 
पागल चाँद ! 

काँपे बदन 
उघड़ा तन मन 
गगन तले ! 

चाय का प्याला 
सर्दी की बिसात पे 
बौना सा प्यादा ! 

लायें कहाँ से 
धरती की शैया पे 
गर्म रजाई ! 

ठंडी हवाएं 
सिहरता बदन
बुझा अलाव ! 

चाय की प्याली 
सर्दी के दानव को 
दूर भगाए ! 

दे दे इतना 
जला हुआ अलाव 
गरम चाय ! 

आँसू की बूँदें 
तारों के नयनों से 
झरती रहीं ! 

तारों के आँसू
आँचल में सहेजे 
धरती माता ! 


साधना वैद  

Friday, December 25, 2015

एक गुहार सांता से


दुलारे सांता
जानती हूँ मैं
बच्चों का मन रखने के लिये
तुम आओगे ज़रूर !
अपने जादुई थैले में दुबका कर
कुछ उपहार भी लाओगे ज़रूर !
लेकिन सच कहना
क्या आज के बच्चों की ‘मासूमियत’
तुम्हें अभी भी लुभाती है ?
उनकी गंदी मानसिकता,
उनकी आपराधिक गतिविधियां
क्या तुम्हारा कलेजा
छलनी नहीं करतीं ?
रहमदिल सांता !
कहाँ खो गये
वो भोले भाले मासूम बच्चे
जो तुम्हारी प्रतीक्षा में सारी रात
आँखों में ही गुज़ार देते थे
और सुबह उठते ही
घर के कोने में सजे
क्रिसमस ट्री के नीचे रखे
छोटे बड़े मोजों में छिपे उपहारों को
देख कर कितने उल्लसित हो जाते थे !
आज के बच्चे इन उपहारों से नहीं
पिस्तौल, तमंचे, रिवोल्वर से खेलते हैं !
उन्हें खिलौने वाली गुड़िया नहीं
जीती जागती गुड़िया चाहिए
जिसे नोंच कर फेंक देने में उन्हें
अपूर्व सुख मिलता है !
प्यारे सांता !
तुम तो जादूगर हो !
तुम कुछ करो ना !
इस क्रिसमस पर तुम
कोई उपहार लाओ न लाओ
इन बच्चों की मासूमियत,
इनका भोलापन, इनका बचपन   
इन्हें दिलवा दो !
उम्र से पहले बड़े हो गये
इन बच्चों को देख कर
वात्सल्य नहीं उमड़ता सांता
इन्हें देख कर डर लगता है !
तुमसे बस इतनी प्रार्थना है
तुम इन्हें एक बार फिर से 
बच्चा बना दो
इस क्रिसमस पर 
एक बार फिर से तुम इन्हें
  इनका भोलापन लौटा दो !  

साधना वैद


Wednesday, December 23, 2015

शिशिर की भोर




शिशिर ऋतु की सुहानी भोर
आदित्यनारायण के स्वर्ण रथ पर
आरूढ़ हो धवल अश्वों की
सुनहरी लगाम थामे
पूर्व दिशा में शनैः शनैः
अवतरित हो रही है !
पर्वतों ने अपना लिबास
बदल लिया है !
कत्थई रंग के हरे फूलों वाले
अंगवस्त्र को उतार
लाल और सुनहरे धागों से कढ़े
श्वेत दुशाले को अपने तन पर
चारों ओर से कस कर
लपेट लिया है !
पर्वत शिखरों के देवस्थान पर
रविरश्मियों ने अपने जादुई स्पर्श से
अंगीठी को सुलगा दिया है !  
वहाँ पर्वत की चोटियों पर देवता
और यहाँ धरा पर हम मानव
गरम चाय की प्याली
हाथ में थामे शीत लहर से
स्पर्धा जीतने के लिये
स्वयं को तैयार कर रहे हैं !
कल-कल बहती जलधारायें
सघन बर्फ की मोटी रजाई ओढ़
दुबक कर सो गयी हैं !
सृष्टि की इस मनोहारी छटा पर
मुग्ध हो दूर स्वर्ग में बैठे
देवराज इंद्र ने मुक्त हस्त से
अनमोल मोतियों की दौलत
न्यौछावर करने का आदेश
सजल वारिदों को दे दिया है !
नभ में विचरण करते
ठिठुरते श्यामल बादलों के
कँपकँपाते हाथों से छिटक कर
ओस के मोती नीचे धरा पर
यत्र यत्र सर्वत्र बिखर गये हैं !
धन्य धरा ने विनीत भाव से
हर कली, हर फूल,
हर पत्ते, हर शूल
यहाँ तक कि
नर्म मुलायम दूर्वा के
हर तिनके की खुली मंजूषा में
इन मनोरम मोतियों को  
सहेज कर रख लिया है !
शीत ऋतु का यह सुखद
शुभागमन है और प्रकृति के
इस नये कलेवर का
हृदय से स्वागत है,
अभिनन्दन है,
वंदन है !

साधना वैद