Followers

Monday, April 25, 2016

एक विकट समस्या का सरल समाधान - जल





सम्पूर्ण विश्व और हम भारतीय भी इन दिनों जल संकट से जूझ रहे हैं ! दो वर्षों से वर्षा कम हुई है और खेती व जनजीवन के लिये जल का प्रबंध करना सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है !
आइये पानी की समस्या को थोड़ा सरल भाषा में समझें ! वैसे तो अपनी पृथ्वी का ७५% हिस्सा पानी से डूबा हुआ है लेकिन इस पानी का मात्र ०.५% ही मीठा पानी है जो पीने के लिये और खेती व औधोगिक इस्तेमाल के लिये उपयोग में लाया जा सकता है !
अपने देश भारत में यह समस्या कितनी विकट है उसे कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है ! विश्व के सारे भू भाग का मात्र २% भारत के पास है ! जिस पर पूरे विश्व की १६% आबादी का बोझ है और जिसके लिये मीठे पानी की उपलब्धता तो ०.५% का भी ४% ही है !
अब यह भी देख लिया जाए कि मीठा पानी हमको मिलता किस प्रकार है ! सर्वप्रथम यह हमें मिलता है पहाड़ों पर जमी हुई बर्फ के रूप में जिसके बर्फीले ग्लेशियर या हिमनद पिघल-पिघल कर नदियों के रूप में हमारे देश के बड़े हिस्से में मीठे पानी की आपूर्ति का स्त्रोत बने हुए हैं !
वर्षा से प्राप्त होने वाला पानी हमारा मीठे पानी का दूसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है ! यह पानी अनेक बरसाती नदियों को जन्म देता है जो आगे चल कर बड़ी छोटी झीलों व तालाबों को पानी से भर देती हैं ! देश के मध्य भाग के पठार में जो पहाड़ हैं वे स्पंजी चट्टानों और पत्थरों की परतों से बने हुए हैं ! ये बड़ी मात्रा में बरसाती पानी को सोख और रोक लेते हैं और यह संचित बरसाती पानी अनेक उदगम स्थलों से बाहर निकल कर कई छोटी बड़ी जलधाराओं का निर्माण करता है जो आगे जाकर बड़ी नदियों में परिवर्तित हो जाती हैं जिनमें नर्मदा, कृष्णा, ताप्ती, गोदावरी तथा कावेरी आदि प्रमुख हैं ! इन्हीं पर बाँध बना कर बड़े-बड़े जलाशय बनाए गये हैं ! देश के मैदानी भाग और ये पठारी इलाके बरसात के पानी के बहुत बड़े भाग को सोख कर अपने अंदर जमा कर लेते हैं जिसे ग्राउण्ड वाटर कहते हैं ! मीठे पानी का लगभग ४०% जल भूमिगत होकर हमारे उपयोग के लिये उपलब्ध हो जाता है ! 
 
यही जल हमारी कुल खेती की आवश्यकता की ५५% की पूर्ति तो करता ही है साथ ही गाँव की कुल आबादी की दैनिक आवश्यकताओं की ८५% और शहर की कुल आबादी की ५०% जल की आपूर्ति भी यही ग्राउण्ड वाटर कर रहा है जो कूएँ, हैंड पम्प व बोरवेल आदि के माध्यम से हमें प्राप्त होता है !
कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस भूमिगत जल का संरक्षण और इसका जल स्तर गिरने से रोकना हमारी प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए ! सबसे अधिक राहत की बात यह है कि भूमिगत पानी के स्तर के संरक्षण के लिये व उसे और अधिक गिरने से रोकने के लिये जिस ज्ञान व उपायों की ज़रूरत है वह सदियों से हमारे पास मौजूद है और हमारे पूर्वज सदियों से इनका प्रयोग कर समाज को पानी की समस्या से बचाते आये हैं ! गुजरात व राजस्थान की पुरानी हवेलियों में पानी के संग्रहण की इतनी अद्भुत व्यवस्था थी कि उसकी वजह से आपदा के समय कई महीनों तक घरों में बंद लोगों को जल संकट का सामना नहीं करना पड़ता था ! अहमदाबाद की अडलज बावड़ी व आगरा जयपुर के रास्ते में पड़ने वाली चाँद बावड़ी इनके बहुत ही सुन्दर उदाहरण हैं ! ऐसी बावड़ियों को बनाने की तकनीक ना तो अधिक खर्चीली है, ना ही इनके लिये हमें किसी विदेशी सहायता की ज़रूरत है ! ज़रूरत है तो सिर्फ सही समय पर सचेत होने की और सही कदम उठाकर समस्या के समाधान के लिये कृत संकल्प होने की ! 
 
 
राजस्थान एक बहुत कम वर्षा वाला प्रदेश है ! यहाँ हिमालय की बर्फ से बनने वाली कोई झील या नदी नहीं है ! लेकिन यही प्रदेश अपनी छोटी बड़ी झीलों तालाबों और बावडियों के लिये प्रसिद्ध है जिनका निर्माण मनुष्यों द्वारा उस समय किया गया जब ना तो जे सी बी मशीनें अस्तित्व में थीं ना ही बुलडोज़र ! साधन थे सिर्फ फावड़े, कुदाली, तसले और लोक गीत गाते हुए, पसीना बहाते हुए, दृढ़ निश्चयी, मेहनतकश नर नारी ! अब ज़रा हम इस बात पर भी विचार कर लें कि पिछले ४० – ५० सालों में कितने ताल तलैये हमारे इर्द गिर्द थे जिन्हें हमारी नादानी के चलते भर दिया गया और उन पर कंक्रीट के जंगल उगा दिए गये ! 
 
 
 
पानी के उचित संरक्षण के लिये एक बार फिर से हमको उन नदियों पर, जो सिर्फ बरसात में ही बहती दिखाई देती हैं, छोटे छोटे चेक डैम बना कर उनका पानी ताल तलैयों और झीलों में जमा करना होगा ! सूख चुके कूओं में वर्षा का पानी डाल कर भूमिगत पानी के जल स्तर को उठाने का पूरा प्रयास करना होगा ! जी हाँ इसे ही रेन वाटर हार्वेस्टिंग कहते हैं ! इसके छोटे बड़े अनेक रूप हैं और हमें हर संभव तरीके से इन्हें अपनाना होगा ! मेरे विचार से मनरेगा जैसी योजनाओं के लिये उपलब्ध धन व संसाधनों को सिर्फ ऐसी योजनाओं में ही लगाना चाहिए जिससे ग्राउण्ड वाटर का स्तर बढ़ाने में सहायता मिले ! सूझ बूझ से पानी का सही उपयोग कर हमें इसका अपव्यय भी रोकना होगा तब ही हम इस समस्या से छुटकारा पा सकेंगे ! अभी भी देर नहीं हुई है और साधन व हल दोनों ही हमारे पास हैं बस हमें अपने इरादों को मजबूती देनी होगी और सही निर्णय लेने के लिये एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण करना होगा !
 
 
 
साधना वैद