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Friday, June 24, 2016

परछाईं




जहाँ तुम कहोगे वहीं मैं चलूँगी
जिधर पग धरोगे उधर पग धरूँगी !

जो चाहोगे मैं खुद को छोटा करूँगी
मैं पैरों के नीचे समा के रहूँगी !

जो चाहोगे दीवार पर जा चढूँगी
मैं तुमसे भी बढ़ कर ज़मीं नाप लूँगी !

मैं पानी की लहरों पे चलती रहूँगी
मैं दुर्गम पहाड़ों पे चढ़ती रहूँगी ! 

जिधर तुम मुड़ोगे मैं संग में मुड़ूँगी
मैं हर एक कदम संग तुम्हारे बढूँगी !

अंधेरों में तुमको मैं घिरने न दूँगी
अकेला कभी तुमको रहने न दूँगी !

रहूँगी सदा साथ परछाईं बन कर
मगर शर्त है दीप बुझने न दूँगी !

मगर शर्त है दीप बुझने न दूँगी ! 


साधना वैद