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Tuesday, March 29, 2016

बोलो, तुम कौन सा हिस्सा लोगे ?



आज बाँटना हैं तुमसे

कुछ भूली सी यादें

कुछ भीगे से पल

कुछ छिटकते से आज

कुछ छूटे से कल

कुछ रुसवा सी रातें

कुछ गुमसुम से दिन

कुछ झूठे से लम्हे

कुछ सच्चे पल छिन

कुछ कड़ुआती आँखें  

कुछ सीली सी आग

कुछ धुँधलाते रस्ते

कुछ भूले से राग

कुछ रूखे से मौसम

कुछ टूटे से ख्वाब 

कुछ तीखे से जुमले

कुछ हटते नकाब

और इस सब के बीच

कुछ खुले से तुम

कुछ छिपे से हम

  कुछ ढके से तुम  

कुछ उघड़े से हम

कुछ मौन से तुम

कुछ मुखर से हम

कुछ सख्त से तुम

  कुछ पिघले से हम  

कुछ सिमटे से तुम

कुछ बिखरे से हम

कुछ सुलझे से तुम

कुछ उलझे से हम

  कुछ अपने से तुम  

 कुछ बेगाने से हम 

बोलो कौन सा हिस्सा

तुम लेना चाहोगे ?

दोनों हिस्सों में  

अब कोई फर्क नहीं है

जो लेना चाहो ले लो !

क्योंकि ज़िंदगी के इस मोड़ पर

किसी भी हिस्से का हासिल  

अब सिर्फ दर्द ही तो है !

फिर चाहे वह

तुम्हारा नसीब हो

या फिर हमारा

   क्या फर्क पड़ता है !  



साधना वैद  









Saturday, March 26, 2016

आया बसंत छाया बसंत




जता देते हैं 
भ्रमर के सुगीत 
आया बसंत ! 

जागी प्रकृति 
खिल गयीं कलियाँ 
पंछी चहके ! 

अल्पना सजी 
घर आँगन द्वारे 
साँझ सकारे ! 

रंगों का खेल 
खेल रही प्रकृति 
फूलों के संग ! 

गाते झरने 
झूमते खलिहान 
मुग्ध वसुधा ! 

आम का बौर 
सुरभित पवन 
कूके कोकिला ! 

प्रेम का राग 
मन में अनुराग 
झुकी पलकें ! 

तुम न आये 
बैरी चाँद सताए 
कुछ न भाये ! 

सुबह हुई 
हमसफ़र चाँद 
घर को चला ! 

प्रिया उदास 
है फीका मधुमास 
पिया न पास ! 


साधना वैद

Wednesday, March 23, 2016

होली की हार्दिक शुभकामनायें




रंग गुलाल 
अम्बर हुआ लाल 
मचा धमाल ! 

पिया साँवरे 
रंग दो चुनरिया 
धानी रंग में ! 

होली का पर्व 
प्रेम भरे रंगों से 
खेलें सगर्व ! 

रंग रंगीला 
प्यार मोहब्बत का 
त्यौहार आया ! 

जीने का ढंग 
सिखाती है सबको 
रंगीली होली ! 

होली के रंग 
हृदय में उमंग
साजन संग ! 

आ जा रे कान्हा 
खेलूँ तेरे संग मैं 
जी भर होली ! 

मनमोहना 
रंगो अपने रंग 
राह तकूँ मैं ! 

होली का पर्व 
काले पीले चेहरे 
भाँग का नशा ! 

बच्चे हुलसे 
मचाएं हुड़दंग 
साथियों संग ! 

माँ की रसोई 
व्यंजनों की सुगंध 
भूख बढ़ाए ! 

जला दें आज 
दुश्मनी बैर भाव 
होली की आग !


साधना वैद
 

Sunday, March 20, 2016

दर्द ने कुछ यूँ निभाई दोस्ती





दर्द ने कुछ यूँ निभाई दोस्ती
झटक कर दामन खुशी रुखसत हुई
मोतियों की थी हमें चाहत बड़ी
आँसुओं की बाढ़ में बरकत हुई !

साधना वैद

Friday, March 18, 2016

हाँ ! वो सच्चे वीर थे




हाँ ! वो सच्चे वीर थे
भारत की पावन माटी के
वो रक्षक रणवीर थे !
सबल सशक्त शत्रु के आगे 
झुके नहीं नत मस्तक हो !
कमर तोड़ने को शत्रु की
लड़ते रहे समर्पित हो !
हँसते-हँसते झूल गये वो
फाँसी के फंदे को चूम !
थी उनमें कुछ बात अनोखी  
रहते थे मस्ती में झूम !
सीमित साधन और निर्धनता
कभी न आड़े आ पाई !
बड़े–बड़े उनके करतब से
दुश्मन पर भी बन आई !
जाने कितने फौत हो गये
जालियाँवाला बाग में
जाने कितने लटकाए पेड़ों पर
वन और बाग में !
भगत सिंह, सुख देव, राजगुरु
अशफाकुल्ला और आज़ाद
जान लुटा दी सबने अपनी
करने को भारत आज़ाद !
और न जाने कितने ही
दीवानों का लिखा है नाम
भारत माता की रक्षा में
हँस कर दे दी अपनी जान !
काश आज के भारत वासी
याद रखें उनका बलिदान
जात पात और ऊँच नीच को
भूल करें उनका सम्मान !
चलें दिखाए उनके पथ पर
करें देश पर वो अभिमान
अपने सत्कर्मों से रौशन
करें विश्व में अपना नाम !

साधना वैद