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Monday, November 28, 2016

हासिल



कितनी बातें थीं कहने को
जो हम कहते तुम सुन लेते
कितनी बातें थी सुनने को
जो तुम कहते हम सुन लेते !

लेकिन कुछ कहने से पहले
घड़ी वक्त की ठहर गयी  
सुनने को आतुर प्राणों की
आस टूट कर बिखर गयी !

बीत गयी वो घड़ी तो देखो
किस्सा ही सब खतम हुआ
खतम हुआ किस्सा तो घुट कर
दो रूहों की मौत हुई ! 

फिरते हैं अब दोनों ही बुत
अपनी-अपनी धुरियों पर  
जैसे कहीं दूर जाने को
सारी वजहें खतम हुईं  

क्यों जीते हैं सपनों में जब
स्वप्न टूट ही जाते हैं
खामखयाली में जीने की
सज़ा यही तजवीज हुई ! 

सपनों में जीने वालों का
एक यही तो हासिल है   
दिन भी बीता रीता-रीता
रात बिलखते बीत गयी !

साधना वैद

Wednesday, November 23, 2016

मुखौटा



मिथ्या बौद्धिकता,
झूठे अहम और छद्म आभिजात्य
के मुखौटे के पीछे छिपा
तुम्हारा लिजलिजा सा चेहरा
मैंने अब पहचान लिया है
और सच मानो
इस कड़वे सत्य को
स्वीकार कर पाना मेरे लिए
जितना दुष्कर है उतना ही
मर्मान्तक भी है !
मुखौटे के आवरण के बिना
इस लिजलिजे से चहरे को
मैंने एक बार
पहले भी देखा था
पर किसी भी तरह उसे
तुम्हारे लोकरंजित
गरिमामय व्यक्तित्व के साथ
जोड़ नहीं पा रही थी
क्योंकि मैं यह विश्वास
कर ही नहीं कर पा रही थी
कि एक चेहरा तुम्हारा
ऐसा भी हो सकता है !
मेरे लिए तो तब तक
तुम्हारा मुखौटे वाला
चेहरा ही सच था न
और शायद इसीलिये खुद को
छल भी पा रही थी कि
यह लिजलिजा सा चेहरा
तुम्हारा नहीं
किसी और का होगा !
लेकिन अब जब
सारी नग्न सच्चाइयाँ
मेरे सामने उजागर हैं
खुद को छलना मुश्किल है !
और उससे भी मुश्किल है
अपनी इस पराजय को
स्वीकार कर पाना
कि जीवन भर मैंने जिसे
बड़े मान सम्मान,
श्रद्धा और आदर के साथ
अपने अंतर्मन के
सर्वोच्च स्थान पर
स्थापित किया
अपना सबसे बड़ा आदर्श
और पथदर्शक माना
वह सिर्फ और सिर्फ
माटी का एक
गिलगिला सा ढेला है
इससे अधिक कुछ भी नहीं ! 


साधना वैद

Saturday, November 19, 2016

तुरुपी चाल





अचूक वार
किये एक तीर से
कई शिकार

फुस्स हो गया
आतंकी कारोबार
कड़ा प्रहार

मन में खोट
बाँटे थे जाली नोट
आतंकी चाल

जनता खुश
काले धन पे गाज
नेता नाराज़

मन में चोर
नेता जी बौखलाएं
हल्ला मचाएं

तुरुपी वार
चित्त एक बार में
सारे मक्कार

मन में आस
सूर्योदय सा भास
मुख पे हास

लम्बी कतार
घंटों का इंतज़ार
सब भूलेंगे
जब मिलेगा न्याय
   खत्म होगा अन्याय ! 




साधना वैद




Wednesday, November 16, 2016

बेरुखी


हर मौसम में हमेशा ही
भरपूर बहार की बेपनाह खूबसूरती
और दिलकश खुशबू से भरे रहने वाले
इस रंगीन बाग़ का रास्ता 
बहार शायद अब भूल गयी है !
मुद्दत हुई इस बाग़ में
अब फूल नहीं खिलते
और सारे फूलदार पौधे
सर झुकाए पशेमान से खड़े हैं
एकदम बेरौनक, वीरान 
और बेहद उदास !
खूबसूरत परिंदों ने अपना बसेरा
शायद किसी और बाग़ में
बना लिया है !
अब सुबह शामें उनकी
ज़िंदगी से भरी चहचहाहट से
गुलज़ार नहीं होतीं ! 
खुशबू की जगह हवाओं में
अब धूल सी उड़ने लगी है
जो आँखों को हमेशा किरकिराहट
और आँसुओं से तर रखती है
कि ये धुँधलाई आँखें
कोई दूसरा दिलनशीं मंज़र देख
कभी मुतासिर हो ही न सकें !
फूल नहीं हैं तो
तितलियों ने भी
बाग़ में आना छोड़ दिया है
और शायद इसीलिये
ज़िंदगी की छोटी-छोटी
खुशियों और खूबसूरती से
रौनक और रंगीनियों से
जीने की ख्वाहिश और जज़्बे से
यह दिल इतना
बेज़ार हो चुका है कि
अब कुछ भी दिल को नहीं छूता !
कहीं इन सबका सबब
तेरी बेरुखी तो नहीं !

साधना वैद  


Sunday, November 13, 2016

ये बच्चा किसका बच्चा है - इब्ने इंशा




बाल दिवस पर विशेष
आज आपके साथ मशहूर शायर जनाब इब्ने इंशा की एक नज़्म साझा करना चाहती हूँ इसे जब भी पढ़ती हूँ मन पीड़ा से भर उठता है और मैं चाहती हूँ कि इसे आप सब भी ज़रूर पढ़ें क्योंकि जब भी मन में करुणा जागती है तभी जगत में कहीं न कहीं सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का 
आविर्भाव होता है !


यह बच्चा किसका बच्चा है ?
यह बच्चा काला काला सा
यह काला सा मटियाला सा
यह बच्चा भूखा भूखा सा
यह बच्चा सूखा सूखा सा
यह बच्चा किसका बच्चा है ?
जो रेत पे तन्हा बैठा है

ना इसके पेट में रोटी है
ना इसके तन पर कपड़ा है
ना इसके सर पर टोपी है
ना इसके पैर में जूता है
ना इसके पास खिलौनों में
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना इसका जी बहलाने को
कोई लोरी है, कोई झूला है
ना इसकी जेब में धेला है
ना इसके हाथ में पैसा है
ना इसके अम्मी अब्बू हैं
ना इसके आपा खाला हैं
यह सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है


यह सहरा कैसा सहरा है
ना इस सहरा में बादल हैं
ना इस सहरा में बरखा है
ना इस सहरा में बाली है
ना इस सहरा में खो़शा है
ना इस सहरा में सब्ज़ा है
ना इस सहरा में साया है
यह सहरा भूख का सहरा है
यह सहरा मौत का सहरा है
 

यह बच्चा कैसे बैठा है
यह बच्चा कब से बैठा है
यह बच्चा क्या कुछ पूछता है
यह बच्चा क्या कुछ कहता है
यह दुनिया कैसी दुनिया है
यह दुनिया किसकी दुनिया है


इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में
कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है
कहीं बादल घिर-घर आते हैं
कहीं चश्मा है कहीं दरिया है
कहीं ऊँचे महल अटरिया हैं
कहीं महफिल है, कहीं मेला है
कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे
यह रेशम है, यह दीबा है
कहीं गल्ले के बाज़ार सजे
सब गेहूँ धान मुहय्या है
कहीं दौलत के संदूक भरे
हाँ, ताँबा, सोना, रूपा है
तुम जो माँगो सो हाज़िर है
तुम जो चाहो सो मिलता है
इस भूख के दुख की दुनिया में
यह कैसा सुख का सहरा है?
वो किस धरती के टुकड़े हैं
यह किस दुनिया का हिस्सा है?


हम जिस आदम के बेटे हैं
यह उस आदम का बेटा है
यह आदम एक ही आदम है
वह गोरा है या काला है
यह धरती एक ही धरती है
यह दुनिया एक ही दुनिया है
सब इक दाता के बंदे हैं
सब बंदों का इक दाता है
कुछ पूरब-पच्छिम फ़र्क नहीं
इस धरती पर हक़ सबका है
यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा यहाँ जो बैठा है
इस बच्चे की कहीं भूख मिटे
(क्या मुश्किल है हो सकता है)
इस बच्चे को कहीं दूध मिले
(हाँ, दूध यहाँ बहुतेरा है )
इस बच्चे का कोई तन ढाँके
(क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है)
इस बच्चे को कोई गोद में ले
(इन्सान जो अब तक ज़िंदा है)
फिर देखिये कैसा बच्चा है
यह कितना प्यारा बच्चा है !


इस जग में सब कुछ रब का है
जो रब का है वो सबका है
सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं
हर चीज़ में सबका साझा है
जो बढ़ता है जो उगता है
वह दाना है या मेवा है
जो कपड़ा है या कंबल है
जो चाँदी है, या सोना है
वह सारा है इस बच्चे का
जो तेरा है, जो मेरा है
यह बच्चा किसका बच्चा है ?
यह बच्चा सबका बच्चा है

...शायर - इब्ने इंशा...


                                         प्रस्तुति - साधना वैद


Friday, November 11, 2016

प्रदूषण घटायें - पर्यावरण बचायें


पैदल चलें
हवा को शुद्ध रखें
रिक्शे में बैठें 

दोस्ती निभाएं 
प्रदूषण घटायें 
साथ में जायें 

दूरियाँ बढ़ीं 
वाहन भी तो बढ़े
धुआँ भी बढ़ा 

कारें ही कारें 
दिखतीं सड़क पे 
हवा में धुआँ 

थोड़ी सी दूरी 
पैदल तय करें 
धुंए से बचें 

कोई और क्यों 
प्रदूषण का दोषी 
खुद को देखें 

चन्दा सूरज 
धुंए की चादर में 
धुँधले दिखें 

बीमार हुआ 
धूम्रलती के संग 
ना पीने वाला 

ग्रहण करें
आपका छोड़ा धुआँ 
बीमार लोग

करे बीमार 
आपके अपनों को 
आपकी लत 

छोड़ें व्यसन 
बीड़ी सिगरेट का 
चैन से जियें 

हुआ अनर्थ 
आपके व्यसन से 
बच्चा बीमार 



साधना वैद


Tuesday, November 8, 2016

दीवाली की रात - बाल कथा






दीपावली की रात थी ! चारों तरफ पटाखों का शोर था ! कहीं अनार छोड़े जा रहे थे तो कहीं बम चल रहे थे ! कहीं रॉकेट शूँ-शूँ कर आसमान में सितारों से गले मिलने के लिए उड़े जा रहे थे तो कहीं लंबी सड़क पर एक कोने से दूसरे कोने तक बिछी हुई लड़ियों की श्रंखला आने जाने वाले राहगीरों को त्रस्त करती ज़ोर के धमाकों के साथ बजती ही जा रही थी ! सुरेश के यहाँ भी कॉलोनी के बहुत सारे बच्चे और बड़े एकत्रित हो गए थे और बड़ी धूमधाम के साथ पटाखे चलाये जा रहे थे ! उसके घर के नीम के पेड़ पर गौरैया का नन्हा चूज़ा डरा सहमा हुआ घोंसले में अपनी माँ के पंखों के नीचे दुबका हुआ था ! भय के मारे उसका कलेजा काँप रहा था ! माँ बार-बार उसे चोंच से सहला रही थी लेकिन उसका भयभीत मन किसी भी तरह से आश्वस्त नहीं हो रहा था ! कॉलोनी के अनेकों जांबाज़ कुत्ते इस समय पटाखों से डर कर सड़क पर खड़ी कारों के नीचे दुबक कर बैठ गए थे ! 
  
नीम के इस वृक्ष पर और भी कई प्राणी रहते थे ! बगल वाली डाल पर बन्दर मामा का परिवार रहता था ! ऊपर वाली डाल पर खुराफाती भूरी बिल्ली रहती थी ! नीचे वाली डाल पर गिलहरी मौसी का घर था ! आम दिनों में तो चूज़े को इन लोगों से भी डर लगता था लेकिन आज सबकी मनोदशा पटाखों के कान फोडू शोर के मारे एक सी हो रही थी ! तभी अपनी दिशा से भटक कर एक रॉकेट सीधा नीम के पेड़ की तरफ आया और पत्तों के बीच में दुबके बन्दर मामा के छोटे से बच्चे की पीठ में चुभ गया ! बच्चा पेड़ से नीचे गिरा धड़ाम ! बंदरिया मामी गुस्से से एकदम आगबबूला होकर ज़ोर से चिचियाई ! उसकी आवाज़ सुन कर ढेर सारे बन्दर आसपास के सारे पेड़ों से भाग कर नीम के पेड़ के पास आ गए ! और सबने मिल कर वहाँ ज़ोर से धावा बोल दिया जहाँ कॉलोनी के लोग मिल कर पटाखे चला रहे थे ! कोई फुलझड़ी का पैकेट लेकर भागा तो कोई अनार का ! किसीने झिलझिल का पैकेट फाड़ डाला तो किसीने बम का पैकेट हवा में उछाल दिया ! लोगों में हड़कम्प मच गया बंदरों की ये आफत कहाँ से टूट पड़ी ! इस सारे तमाशे के बीच मामी अपने बच्चे को सीने से चिपटाए व्याकुल स्वर में क्रंदन कर रही थी ! सुरेश के पापा की नज़र उस पर पड़ी तो वे फ़ौरन सब समझ गए ! उन्होंने तुरंत ही डॉक्टर को फोन कर बुलवाया और नन्हे बन्दर का उपचार करवाया ! उसे चोट अधिक नहीं लगी थी लेकिन वह डर बहुत गया था ! उस दिन पटाखे चलाने का कार्यक्रम उसी वक्त स्थगित हो गया ! सुरेश के पापा ने सबको बड़े प्यार से समझाया कि ऐसी आतिशबाजी चलाने से हमको बचना चाहिए जिस पर हमारा कोई नियंत्रण ना हो ! इंसानों के अलावा हमारे आसपास के परिवेश में अनेकों प्राणी रहते हैं जो हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग हैं हमें उनकी सुरक्षा और सुविधा का भी ध्यान रखना चाहिए ! पेड़ पौधों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए ! अनार आदि चलाने से दूर तक और देर तक चिंगारियाँ धरती पर गिरती रहती हैं जिनसे पौधे झुलस जाते हैं ! 

सबने सुरेश के पापा की बात का अनुमोदन किया और संकल्प लिया कि आइन्दा वे कभी ऐसे पटाखे नहीं चलाएंगे जिनसे हमारे पर्यावरण को हानि पहुँचे ! 



साधना वैद