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Thursday, April 27, 2017

मैं नदी हूँ


बहती रही 
अथक निरंतर 
मैं सदियों से 

करती रही 
धरा अभिसिन्चित
मैं सदियों से 


साधना वैद

Monday, April 24, 2017

स्याही से लिखी तहरीरें






बचपन में जब लिखना सीख रही थी
स्लेट पर बत्ती से जाने क्या-क्या
उल्टा सीधा लिखती थी  
फिर उन विचित्र अक्षरों और
टेढ़ी मेढ़ी आकृतियों को देख
खूब जी खोल कर हँसती थी !
अपना ही लिखा जाने कितनी बार
मिटाया करती थी
फिर गीले कपड़े से पोंछ कर स्लेट को
खूब चमकाया करती थी !  
नए सिरे से जमा-जमा कर
सुन्दर अक्षरों में फिर से कुछ
नया लिख देती थी
और अपनी अनगढ़ अधकचरी
कलाकृतियों को देख खुद ही
खूब खुश हो लेती थी !  
कुछ बड़ी हुई तो कॉपी पर
पेन्सिल से लिखना शुरू हुआ
बार-बार गलत लिखा मिटाने से
जर्जर होते पन्नों की दशा देख
मलिन मन होने का
सिलसिला शुरू हुआ !
उस पन्ने पर कुछ भी दोबारा
लिखना मुश्किल हो जाता
बार-बार कोशिश करने से
पन्ना ही बिलकुल फट जाता !
धीरे-धीरे समझ में आ गया
गलतियों को दोहराने की
उम्र अब बीती जा रही है
सुलेख लिखना अब आसान नहीं रहा
भूल सुधार की गुंजाइश  
कम होती जा रही है !
समय के साथ जल्दी-जल्दी कदम बढ़ा
उम्र भी आगे बढ़ती रही
कल्पनाओं, सपनों, भावनाओं के
फलक को नापती टटोलती  
दीवानगी भी साथ चलती रही !
स्लेट बत्ती, रबर पेन्सिल के
बचकाने खेल सब पीछे छूट गए
हाथों में आ गयी सुनहरी डायरी
खूबसूरत कलम और स्याही की दवात
जो पता नहीं कब और कैसे
दिनों का चैन और रातों की नींद
सब लूट ले गए !
अब वक्त के सफों पर गहरी स्याही से
जो तहरीरें लिखनी होतीं उनका
पाबंदी के साथ एक ही बार में
सत्य शिव और सुन्दर होना
परम आवश्यक हो गया !
असावधानीवश कुछ भी लिख देना और
खाम खयाली में डूब पन्नों पर
कुछ भी उकेर देना जैसे
अब गुनाह सा हो गया !
लेकिन जैसा होना चाहिए
वैसा होता कहाँ है
जो लिख दिया सही गलत
वह मिटता कहाँ है !
ज़िंदगी की डायरी के हर पन्ने पर उकेरी हुई
जाने कितनी कटी पिटी लाइनें हैं,
जाने कितनी आधी अधूरी कवितायें हैं,
जाने कितने आधे अधूरे किस्से हैं
जो किसी अंजाम तक
या तो पहुँच ही नहीं पाए
या जहाँ पहुँच गए वहाँ से
यह जानते हुए भी कि
वो उनके मुकाम न थे
लौट नहीं पाए !
जो लिख गया सब गलत हो गया  
सारा अर्थ का अनर्थ हो गया !
सोचती ही रह जाती हूँ
गहरी स्याही में लिखी इन
गलत सलत तहरीरों को मिटाने के लिए
कोई तो चमत्कारिक साबुन मिल जाए
कि यह सब धुल पुँछ कर
पहले सा नया हो जाए
या फिर किसी भी जतन से
मेरी डायरी का हर कटा पिटा शब्द
किसी जादू से छूमंतर हो जाए
प्रभु की मुझ पर
बस इतनी सी दया हो जाए !

साधना वैद   



Thursday, April 20, 2017

अंतहीन सिन्धु सा तेरा अंतर माँ



अंतहीन सिन्धु सा तेरा अंतर माँ



सर्वोच्च स्थान

आदि शक्ति माता का

शाश्वत सत्य



असीम नभ

अपरिमित धरा

तेरा आलय



माँ तेरी कृपा

अथाह सागर सी

अपरम्पार



जग जननी

अगाध तेरा प्यार

सुखी संसार



दयामयी माँ

बेहद दीन पर  

करम कर



ममतामयी

अंतहीन सिन्धु सा

तेरा अंतर



अनंत शून्य

व्योम तक विस्तीर्ण

तेरी महिमा



शब्द अशेष

कैसे हो गुणगान

मैं नादान माँ



करूँ गुहार

माँ तेरी ममता का

आर न पार



कैसे समेटूँ

विपुल तेरा प्यार

गयी मैं हार



गाये संसृति

चिरंतन युग से

माँ की वन्दना



दीप जलाऊँ

आरती गाऊँ करूँ

माँ की अर्चना





साधना वैद




Sunday, April 16, 2017

द्रौपदी का दर्द


कब तक तुम उसे 
इसी तरह छलते रहोगे !
कभी प्यार जता के, 
कभी अधिकार जता के,
कभी कातर होकर याचना करके,
तो कभी बाहुबल से 
अपना शौर्य और पराक्रम दिखा के,
कभी छल बल कौशल से 
उसके भोलेपन का फ़ायदा उठाके,
तो कभी सामाजिक मर्यादाओं की 
दुहाई देकर उसकी कोमलतम 
भावनाओं का सौदा करके ?
हे धर्मराज युधिष्ठिर
भरी सभा में धन संपत्ति की तरह 
अपनी पत्नी द्रौपदी को 
चौसर की बाजी में हार कर 
और दुशासन के हाथों
उसके चीरहरण का लज्जाजनक दृश्य देख
तुम्हें अपने पौरुष पर 
बड़ा अभिमान हुआ होगा ना ?
छि:, लानत है तुम पर
पाँच-पाँच पति मिल कर भी
एक पत्नी के सतीत्व की 
रक्षा न कर सके !
क्यों युधिष्ठिर
शर्म तो नहीं आई थी न तुम्हें ?
पत्नी की लाज हरी गयी तो क्या हुआ
तुम तो आज भी 
‘धर्मराज’ ही कहलाते हो
क्या यही था तुम्हारा ‘धर्म’ ? 
भरी सभा में अपमानित होती 
द्रौपदी के नेत्रों से बरसती अश्रुधार 
और तानों, उलाहनों उपालम्भों के 
अग्नेयास्त्र भी क्यों तुम्हारे 
मृतप्राय आत्माभिमान को 
जगा नहीं सके ? 
बोलो युधिष्ठिर 
है कोई उत्तर तुम्हारे पास ?
आखिर कब तक तुम नारी के कंधे पर
बन्दूक रख कर अपने निशाने लगाते रहोगे ?
अब तो बस करो !
कब तलक देवीबनाओगे उसे
'मानवी' भी ना समझ पाये जिसे !

साधना वैद