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Thursday, March 2, 2017

फागुन आया






 धीमी आहट

छलका मधु घट

आया बसंत


प्रतीक्षा रत

विरहिणी नायिका

नैन बिछाये


खिली कलियाँ

भ्रमर गीत गाते

छाया बसंत


हर कलिका

करती अभिसार

वारे पराग


दूँ मैं दुहाई 
   
मधु ऋतु है आई

आनंद लाई


छाया बसंत

घर आओ ना कंत

मैं देखूँ पंथ


उड़ चला है

बसंत संग दिल

कहाँ मानेगा


खोया बेसुध

प्रिय की स्मृतियों में

दीवाना दिल


लागे न जिया

फागुन का महीना

आ जाओ पिया


कोरी चूनर

भीगने को आतुर

प्रेम रंग में


कैसे बचोगे

मेरी पिचकारी से

बोलो कन्हैया


होके अधीर

रंग डालूँगी भीर

कालिंदी तीर



साधना वैद