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Thursday, March 16, 2017

बाप का साया




आज कमला के हाथ कुछ ज्यादह ही तेज़ी से चल रहे थे ! वैसे भी वह बहुत फुर्तीली है इसमें कोई संदेह नहीं !
“क्या बात है कमला कहीं जाना है क्या ? आज तो तुम्हारा झाडू पोंछा बर्तन कपडे सारे काम आधे घंटे में ही निबट गए ! ठीक से किये भी हैं या ऐसे ही बेगार टाल दी है ?” मेरी आवाज़ में असंतोष झलक रहा था !
“कैसी बात करती हो दीदी ! आप खुद ही देख लो न ! सारा घर चकाचक चमक रहा है ! मैंने दो घर और पकड़ लिए हैं दीदी ! इतनी मंहगाई में दो तीन घरों के काम से गुज़ारा नहीं होता ! फिर आज मुझे बाज़ार भी जाना है ! होली के त्यौहार पर बेटी दामाद घर आयेंगे तो कुछ तैयारी तो करनी पड़ेगी ! बडकी की शादी के बाद की पहली होली है तो उसके सासरे में भी उसके सास ससुर देवर जेठ के लिए कपडे, कचरी, पापड, बड़ी, मंगौरी, फल, मिठाई भेजनी पड़ेगी ! उसका भी इंतजाम करना है नहीं तो ससुराल में उसे सबकी बातें सुननी पड़ेंगी ! दोनों लड़कों की स्कूल की फीस भरनी है ! नए क्लास में आ जायेंगे तो कॉपी किताबें भी खरीदनी पड़ेंगी ! आप ही बताओ और काम नहीं करूंगी तो कैसे इतने खर्चे पूरे होंगे !”
कमला का रेकॉर्ड चालू हो गया था !
“क्यों तुम्हारा घरवाला कुछ भी नहीं कमाता क्या ? सारी जिम्मेदारी तुम्हारी ही है ? वह भी तो कारखाने में काम करता है ना ?” मुझे गुस्सा आ रहा था !
“कमाते क्यों नहीं हैं ! खूब अच्छे पैसे मिलते हैं उन्हें ! लेकिन घर खर्च के लिए कभी सौ रुपये भी नहीं दिए ! सारे पैसे दारू और जूए में कहाँ खर्च हो जाते हैं ये तो वो ही जाने ! उलटे मुझसे ही माँग कर ले जाते हैं ! मना कर दूँ तो रोज़ कलेस हो घर में !”
“अरे तो क्यों उसका पल्लू थामे बैठी हो ! पीछा छुडाओ उससे अपना !” मैं उत्तेजित होकर बोली !
“कैसी बातें कर रही हो दीदी ?” कमला का चेहरा बेरंग हो उठा था ! “वो जैसे भी हैं मेरे सारे तीज त्यौहार चूड़ी, बिंदी, सिन्दूर, बिछुआ सब उन्हीं से तो हैं दीदी ! घर में पैसे नहीं देते तो न सही पर बच्चों के सर पर बाप का साया तो है !”
अब अवाक होने की बारी मेरी थी !

साधना वैद