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Saturday, July 1, 2017

वापिसी




अभी तो लौटी हूँ !
मैं गयी तो थी निश्चित रूप से
यही सोच कर कि मैं
मंदिर में ही जा रही हूँ !
लेकिन वहाँ जो कुछ देखा
वह मुझे भ्रमित कर गया !
देवार्पण के लिए पूजा के थाल में
सुरभित सुगन्धित ताज़े फूलों की जगह
सूखी मुरझाई बासी पाँखुरियाँ थीं और
नैवेद्य के लिए मधुर फल और
सरस मिष्ठान्न के स्थान पर
विषैले फल और दूषित मिष्ठान्न
थाल में संजोया हुआ था !  
आरती के लिए सजाया गया वह दीप
शुद्ध घी का पावन दीप नहीं था !
उसे तैयार किया गया था
ऐसे भीषण ज्वलनशील पदार्थ से
जिसके जलते ही सर्वस्व जल कर
भस्म हो जाये और सबके हृदय
भयाक्रांत हो जायें !
प्रभु के माथे पर तिलक का
श्रृंगार करने के लिए वहाँ
चन्दन और कुमकुम का
शीतल लेप नहीं था वहाँ था
ऐसा लेप जो अंतिम समय में
तैयार करते समय शवों के ललाट पर
लगाया जाता है उनके
महाप्रस्थान से पहले !  
प्रार्थना के मंत्रों और श्लोकों में  
न विनय थी, न भक्ति,
न दीनता थी, न करुणा    
स्वरों में जो स्पष्ट रूप से
ध्वनित हो रही थी वह थी
किसी अघोरी तांत्रिक की
प्रेत साधना की ऐसी हुंकार,
ऐसी ललकार, ऐसी चुनौती
जो किसी का भी कलेजा चीर दे !
पूजा की ऐसी सारी विधियाँ  
किसी प्रेम, किसी सामंजस्य,  
किसी श्रद्धा, किसी समर्पण को
परिभाषित नहीं कर रही थीं  
वे तो परिभाषित कर रही थीं बस
ऐसे अलगाव को, ऐसी टूटन को,
ऐसे बिखराव, ऐसे विघटन को
जिसके बाद कुछ भी समेटना
नितांत असंभव हो जाए !
मन में इतनी अशांति और द्वन्द्व है  
कि सोच ही नहीं पा रही हूँ
मैं किसी मंदिर से लौटी हूँ या
फिर किसी श्मशान से !


साधना वैद