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Thursday, July 6, 2017

सूखा पेड़




वृद्ध होकर मैं धरा पर एक दिन गिर जाउँगा 
जानता हूँ मैं किसीके काम फिर ना आउँगा ! 

अब नहीं फलते रसीले आम मेरी शाख पर 
लग रहा बट्टा मेरी ऐश्वर्यशाली साख पर !

हैं नहीं पावन मुलायम पात वन्दनवार को 
पोंछने को हैं न पत्ते पथिक की श्रम धार को ! 

दे नहीं सकता हवा अब मैं किसी भी क्लांत को 
तनिक छाया दे न पाऊँ श्रांत से दिग्भ्रांत को ! 

संकुचित होते विहग भी बैठने में डाल पर 
पड़ न जाए काल की दृष्टि सुखी संसार पर ! 

है झुलाया जिनको वर्षों लोग वो डरने लगे 
टूट ना जाएँ मेरी सूखी भुजा कहने लगे ! 

किन्तु फिर भी हूँ खड़ा मैं आज भी अभिमान से 
हूँ अकिंचन आज पर जीवन जिया है शान से ! 

आज भी है हौसला और जोश भी कुछ कम नहीं 
दिया जो अब तक जगत को मान उसका कम नहीं !

जगत की अवहेलना का दंश चुभता है मुझे 
लिया जिसने ज़िंदगी भर दे सकेगा क्या मुझे ! 

जग मुखर सामर्थ्य पर अवसान पर वह मौन है 
वृद्ध दुर्बल जर्जरों का इस जगत में कौन है ! 

कोई समझे या न समझे है ‘उसे’ सबकी फिकर 
अनवरत संघर्ष पर मेरे ‘उसे’ होता फखर !

किया अभिनन्दन मेरा देकर मुझे सम्मान यह 
है मुझे स्वीकार मन और प्राण से वरदान यह ! 

मुकुट से जो दीखते हैं पात मेरे शीश पे 
किया है श्रृंगार प्रभु ने प्रेम से आशीष दे !



साधना वैद
चित्र - गूगल से साभार