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Saturday, October 14, 2017

खूँटा



तुमने ही तो कहा था 
कि मुझे खुद को तलाशना होगा 
अपने अन्दर छिपी तमाम अनछुई 
अनगढ़ संभावनाओं को सँवार कर 
स्वयं ही तराशना होगा 
अपना लक्ष्य निर्धारित करना होगा 
और अपनी मंजिल भी 
खुद ही तय करनी होगी 
मंजिल तक पहुँचने के लिए 
अपने मार्ग को भी मुझे स्वयं ही 
सुगम बनाना होगा 
राह के सारे कंकड़ पत्थर चुन कर 
मार्ग को अवरुद्ध करने वाले 
सारे कटीले झाड़ झंखाड़ों को साफ़ कर ! 
मैंने तुम्हारे हर वचन को 
पूरी निष्ठा के साथ शिरोधार्य किया ! 
हर आदेश निर्देश को पूरी ईमानदारी 
और समर्पण भाव से निभाया ! 
देखो ! मेरे पास आओ ! 
मैंने तलाश लिया है खुद को 
सँवार ली है अपने अन्दर छिपी प्रतिभा 
निर्धारित कर लिया है अपना लक्ष्य 
तय कर ली है अपनी मंजिल और 
रास्ता भी सुगम बना लिया है ! 
लेकिन सब उद्दयम व्यर्थ हुआ जाता है
एक कदम भी मैं इस सुन्दर, 
सजे संवरे प्रशस्त मार्ग पर 
बढ़ा नहीं पा रही हूँ !
वर्षों से इसी एक स्थान पर 
रहने के उपरान्त भी अभी तक 
यह नहीं खोज पाई कि 
जिन श्रंखलाओं ने इतनी लम्बी अवधि तक 
मुझे एक कैदी की तरह यहाँ 
निरुद्ध कर रखा है उसका खूँटा 
कहाँ गढ़ा हुआ है 
यहीं कहीं ज़मीन में 
या फिर मेरे मन में !



साधना वैद

Monday, October 9, 2017

कशमकश




महीने के आरम्भ में
चंद रुपये मेरी हथेली पर रख
जिस तरह तुम निश्चिन्त हो जाते हो
मैं थोड़े ही निश्चिन्त हो सकती हूँ
अपनी सौ ज़रूरतें भुला दूँ
पर बाकी सबकी उम्मीदों पर पानी
थोड़े ही फेर सकती हूँ !
उस पर यह आदेश
सोच समझ कर खर्च करना
कम हों या ज्यादह जैसे भी हो
जुगत के साथ पूरा महीना
इन्ही रुपयों में गुज़र करना !
तुम्हें तो बस जुबान हिलानी होती है
अग्नि परीक्षा तो मुझे ही देनी होती है !
घर के हर सदस्य की
तमाम ज़रूरतें, अनगिनत इच्छाएं,
ढेर सारे अरमान, उफनती हसरतें
सब इन थोड़े से रुपयों की
सीमित क्रयशक्ति में कैसे समेट लूँ
सारे परिवार की परवान चढ़ती उमंगों को
इस छोटी सी चादर में कैसे लपेट लूँ !  
इनकी चाहतों के धागे
एक दूसरे के साथ गुथ कर
कितनी बुरी तरह से उलझ गए हैं
कभी जाना है तुमने ?
और उन्हें सुलझाते सुलझाते  
मैं कितना टूट जाती हूँ
कितना बिखर जाती हूँ
यह भी कभी माना है तुमने ?
कितनी अनगिनत गाँठें लग गयी हैं
बेतरतीब उलझे हुए इन धागों में
जो किसी भी तरह खुलती ही नहीं,
कितनी बार इन्हें खोलते खोलते
मेरे नाखून तक टूट गए हैं
लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी  
पहले सी सीधी सपाट हो
   ये कभी जुड़ती ही नहीं !   
कितनी ही बार भारी मन से
कभी-कभी कैंची से भी काटनी
पड़ जाती हैं ये गाँठें
लेकिन ये कोई साधारण ऊन या
धागों की गाँठें नहीं हैं
उन्हें काट दो तो दर्द नहीं होता
इन्हें काट दूँ तो कई आँखों में
बिजली कौंध जाती है
जो मेरा सुख चैन जला कर
पल भर में राख कर जाती है,   
कई आँखों में घटाएं उमड़ आती हैं
जो मेरी आँखों से रक्तधारा बन
रिमझिम बरसने लगती हैं !
थक गयी हूँ बहुत अब
या तो यह चादर बड़ी हो जाए
या फिर ज़रूरतों के ये धागे
इतने चिकने और मुलायम हो जाएँ
कि इनमें कभी गाँठें लगे ही ना !
बस जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ हों 
ना तो कभी आवेश की बिजली कौंधे
ना कभी सुर्ख रक्त की
जलधार ही बहे !

साधना वैद
 

Thursday, October 5, 2017

थकन



बहुत थक गयी हूँ
मेरे जीवन साथी !
जीवन के इस जूए में
जिस दिन से मुझे जोता गया है
एक पल के लिए भी
गर्दन बाहर निकाल लेने का
मौक़ा ही कहाँ मिला है मुझे !
चलती जा रही हूँ  
चलती जा रही हूँ
बस चलती ही जा रही हूँ
निरंतर, अहर्निश, अनवरत !
कन्धों पर गृहस्थी का जो बोझ
तुमने डाल दिया है उसे तो
जीवन की अंतिम साँस तक
ढोना ही होगा मुझे !
आरम्भ में चाल में जोश था,
उत्साह था, चुनौती थी,
गति थी, संकल्प था, दृढ़ता थी !
लेकिन अब चाल थमने लगी है
पैर थक कर चूर हो गए हैं
जोश, उत्साह, गति सब
तिरोहित हो चुके हैं !
बस अब चल रही हूँ
क्योंकि चलते रहना
एक आदत सी बन गयी है
सो चले जा रही हूँ
चलती ही जा रही हूँ
लेकिन उम्र के इस मुकाम पर
कुछ विश्राम चाहती हूँ
कुछ देर आँखों को मूँद
ग़हरी नींद में सोना चाहती हूँ
क्योंकि पूरी तरह से चूर होकर
तन और मन दोनों ही
इतने निढाल हो चुके हैं कि
अब जीना भी बेमानी सा
लगने लगा है और चलना भी
नितांत असंभव हो गया है !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 

Sunday, October 1, 2017

अब तो मुझे सोने दो




दीवार पर टंगी
बापू की तस्वीर उदास है
स्वर रुंधे हैं, आँखें बे आस हैं
कल जन्मदिन जो आ रहा है
लोगों की बनावटी, झूठी, असहनीय,
खोखली बातों को सुनने का, झेलने का
झेल कर असहज होने का
वही मनहूस दिन कल
फिर से जो आ रहा है !
बापू के मन में
विचारों का तूफ़ान
तेज़ रफ़्तार से चलता रहा  
लुटा दिया सर्वस्व जिन पर
ताउम्र उन्हीं की आँखों में
मैं किरकिरी की तरह
खटकता रहा !
सारे सुख, सारे वैभव त्याग
एक धोती में मैंने अपना  
सारा जीवन काट दिया
लेकिन उनके ऐशो आराम में
कहीं मैं रुकावट न बन जाउँ
इस डर से मेरे साथियों ने मुझसे ही
अपना रास्ता काट लिया !
मेरी बातों से, मेरी नीतियों से  
विदेशी हुक्मरानों की सोच बदली
देश की सूरते हाल बदली
और देश आज़ाद हुआ  
लेकिन मेरी हर सोच, हर बात,
हर सलाह मेरे ही देशवासियों को
नागवार गुज़री और कुछ
असामाजिक तत्वों के बरगलाने से
देश साम्प्रदायिक ताकतों का
गुलाम हुआ !
मेरी सलाह, मेरे मशवरे,
मेरे भाषण, मेरे तस्किरे,
मेरे व्रत, मेरे उपवास
किसी काम न आये,
देश में दंगे हुए, फूट पड़ गयी
बँटवारा हो गया
जनता गाजर मूली की तरह
कटती रही उसे बचाने
ना तो रहीम आये और
ना ही राम आये !
सारी हिंसा का ठीकरा
मेरे सिर फोड़ दिया गया
और मेरी सारी सद्भावनाओं
सारी हित चिंताओं को
परे सरका मुझे गोलियों से
भून दिया गया !
मुझे यूँ नींद में सुलाने के बाद
अब किसलिए यह
ढोंग और दिखावा,
सहा नहीं जाता मुझसे
अपनों के ही हाथों मिला
यह विश्वासघात और छलावा !
बंद करो श्रद्धा और भक्ति का
यह झूठा अभिनय,
यह देशप्रेम और नैतिकता की बातें
जो हो रहा है वह होने दो,
मत डालो मेरी अंतरात्मा पर
राष्ट्रपिता होने के दायित्व का
और गुरुतर बोझ  
मैं थक गया हूँ बहुत
अब तो मुझे चैन से सोने दो !

साधना वैद