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Friday, November 17, 2017

सन्नाटा



दर्पण के सामने खड़ी हूँ
लेकिन नहीं जानती
मुझे अपना ही प्रतिबिम्ब
क्यों नहीं दिखाई देता ,
कितने जाने अनजाने लोगों की
भीड़ है सम्मुख
लेकिन नहीं जानती
वही एक चिर परिचित चेहरा
क्यों नहीं दिखाई देता ,
कितनी सारी आवाजें हरदम
गूँजती हैं इर्द गिर्द
लेकिन नहीं जानती
खामोशी की वही एक
धीमी सी फुसफुसाहट
क्यों नहीं सुनाई देती ,
कितने सारे मंज़र
बिखरे पड़े हैं चारों ओर
लेकिन नहीं जानती
मन की तपन को जो
शांत कर दे वही एक मंज़र
क्यों नहीं दिखाई देता !
नहीं जानती  
यह हमारे ही वजूद के 
मिट जाने की वजह से है
या दुनिया की इस भीड़ में
तुम्हारे खो जाने के कारण
लेकिन यह सच है कि
ना अब दर्पण मुस्कुराता है
कि मन को शक्ति मिले
ना कोई चेहरा स्नेह विगलित  
मुस्कान से आश्वस्त करता है
कि सारी पीड़ा तिरोहित हो जाये ,
ना खामोशी की धीमी-धीमी
आवाजें सुनाई देती हैं
कि हृदय में जलतरंग बज उठे ,
ना आत्मा को तृप्त करने वाला
कोई मंज़र ही दिखाई देता है
कि मन का पतझड़ वसंत बन जाये !
अब सिर्फ सन्नाटा ही सन्नाटा है
भीतर भी और बाहर भी !

साधना वैद

Saturday, November 4, 2017

व्यामोह




यह कैसी नीरसता है
जैसे अब किसी भी बात में
ज़रा सी भी रूचि नहीं रही
पहले छोटी-छोटी चीज़ें भी
कितना खुश कर जाती थीं
मोगरे या सेवंती के फूलों का
छोटा सा गजरा,
काँच के मोतियों की सादी सी माला,
एक मीठा सा गीत,
एक छोटी सी कहानी,
कल कल झर झर बहता झरना,
गगन में उन्मुक्त उमड़ते घुमड़ते
बेफिक्र काले ऊदे बादल,
खूब ऊँचाई पर आसमान में लहराते
दिल के आकार के लाल नीले गुब्बारे,
पेंच लड़ाती रंग बिरंगी पतंगें,
झुण्ड बना कर दूर क्षितिज तक
उड़ान भरते चहचहाते पंछी !
नज़रें इन्हें देखते थकती न थीं
और मन कभी भूले से भी
मुरझाता न था !
अब जैसे सब कुछ
बेमानी सा हो गया है
न कोई भाव जागता है
न कोई खुशी ही मिलती है
ना ही कुछ याद आता है
न ही मन इनमें रमता है !
यह विरक्ति है या व्यामोह
कौन बताये !

साधना वैद